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Rigveda Mandal 1 / Sukta 94 / Mantra 13

191 Sukta
16 Mantra
1/94/13
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वो दे॒वाना॑मसि मि॒त्रो अद्भु॑तो॒ वसु॒र्वसू॑नामसि॒ चारु॑रध्व॒रे। शर्म॑न्त्स्याम॒ तव॑ स॒प्रथ॑स्त॒मेऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

दे॒वः । दे॒वाना॑म् । अ॒सि॒ । मि॒त्रः । अद्भु॑तः । वसुः॑ । वसू॑नाम् । अ॒सि॒ । चारुः॑ । अ॒ध्व॒रे । शर्म॑न् । स्या॒म॒ । तव॑ । स॒प्रथः॑ऽतमे । अग्ने॑ । स॒ख्ये । मा । रि॒षा॒म॒ । व॒यम् । तव॑ ॥

Mantra without Swara
देवो देवानामसि मित्रो अद्भुतो वसुर्वसूनामसि चारुरध्वरे। शर्मन्त्स्याम तव सप्रथस्तमेऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥

देवः। देवानाम्। असि। मित्रः। अद्भुतः। वसुः। वसूनाम्। असि। चारुः। अध्वरे। शर्मन्। स्याम। तव। सप्रथःऽतमे। अग्ने। सख्ये। मा। रिषाम। वयम्। तव ॥ १.९४.१३

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 32 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) जगदीश्वर वा विद्वन् ! जिस कारण आप (अध्वरे) न छोड़ने योग्य उपासनारूपी यज्ञ वा संग्राम में (देवानाम्) दिव्यगुणों से परिपूर्ण विद्वान् वा दिव्यगुणयुक्त पदार्थों में (देवः) दिव्यगुणसंपन्न (अद्भुतः) आश्चर्य्यरूप गुण, कर्म और स्वभाव से युक्त (चारुः) अत्यन्त श्रेष्ठ (मित्रः) बहुत सुख करने और सब दुःखों का विनाश करनेवाले (असि) हैं तथा (वसूनाम्) वसने और वसानेवाले मनुष्यों के बीच (वसुः) वसने और वसानेवाले (असि) हैं इस कारण (तव) आपके (सप्रथस्तमे) अच्छे प्रकार अति फैले हुए गुण, कर्म स्वभावों के साथ वर्त्तमान (शर्मन्) सुख में (वयम्) हम लोग अच्छे प्रकार निश्चित (स्याम) हों, और (तव) आपके (सख्ये) मित्रपन में कभी (मा रिषाम) बेमन न हों ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। किसी मनुष्य को भी परमेश्वर और विद्वानों की सुख प्रकट करनेवाली मित्रता अच्छे प्रकार स्थिर नहीं होती, इससे इसमें हम-मनुष्यों को स्थिर मति के साथ प्रवृत्त होना चाहिये ॥ १३ ॥
Subject
फिर ईश्वर और सभा आदि के अधिपतियों के साथ मित्रभाव क्यों करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।