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Rigveda Mandal 1 / Sukta 94 / Mantra 11

191 Sukta
16 Mantra
1/94/11
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध॑ स्व॒नादु॒त बि॑भ्युः पत॒त्रिणो॑ द्र॒प्सा यत्ते॑ यव॒सादो॒ व्यस्थि॑रन्। सु॒गं तत्ते॑ ताव॒केभ्यो॒ रथे॒भ्योऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

अध॑ । स्व॒नात् । उ॒त । बि॒भ्युः॒ । प॒त॒त्रिणः॑ । द्र॒प्सा । यत् । ते॒ । य॒व॒स॒ऽअदः॑ । वि । अस्थि॑रन् । सु॒ऽगम् । तत् । ते॒ । ता॒व॒केभ्यः॑ । र॒थे॒भ्यः । अग्ने॑ । स॒ख्ये । मा । रि॒षा॒म॒ । व॒यम् । तव॑ ॥

Mantra without Swara
अध स्वनादुत बिभ्युः पतत्रिणो द्रप्सा यत्ते यवसादो व्यस्थिरन्। सुगं तत्ते तावकेभ्यो रथेभ्योऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥

अध। स्वनात्। उत। बिभ्युः। पतत्रिणः। द्रप्सा। यत्। ते। यवसऽअदः। वि। अस्थिरन्। सुऽगम्। तत्। ते। तावकेभ्यः। रथेभ्यः। अग्ने। सख्ये। मा। रिषाम। वयम्। तव ॥ १.९४.११

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 32 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) समस्त विज्ञान देनेहारे शिल्पिन् ! (यत्) जब (ते) तुम्हारे (यवसादः) अन्नादि पदार्थों को खानेहारे (द्रप्साः) हर्षयुक्त भृत्य वा लपट आदि गुण (सुगम्) उस मार्ग को कि जिसमें सुख से जाते हैं (वि) अनेक प्रकारों से (अस्थिरन्) स्थिर होवें (तत्) तब (ते) आपके वा इस भौतिक अग्नि के (तावकेभ्यः) जो आपके वा इस अग्नि के सिद्ध किये हुए रथ हैं उन (रथेभ्यः) विमान आदि रथों से (पतत्रिणः) पक्षियों के तुल्य शत्रु (बिभ्युः) डरें (अध) उसके अनन्तर (उत) एक निश्चय के साथ ही उन रथों के (स्वनात्) शब्द से पक्षियों के समान डरे हुए शत्रु बिलाय जाते हैं, ऐसे (तव) आपके वा इस अग्नि के (सख्ये) मित्रपन में (वयम्) हम लोग (मा, रिषाम) मत अप्रसन्न हों ॥ ११ ॥
Essence
जब आग्नेय अस्त्र-शस्त्र और विमानादि यानयुक्त सेना इकट्ठी कर शत्रुओं के जीतने के लिये वेग से जाकर शस्त्रों के प्रहार वा अच्छे आनन्दित शब्दों से शत्रुओं के साथ मनुष्यों का युद्ध कराया जाता है, तब दृढ़ विजय होता है यह जानना चाहिये। यह स्थिर दृढ़तर विजय, निश्चय है कि विद्वानों के विरोधियों, अग्न्यादि विद्यारहित पुरुषों का कभी नहीं हो सकता, इससे सब दिन इसका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ११ ॥
Subject
फिर इनके कैसे गुण हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।