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Rigveda Mandal 1 / Sukta 93 / Mantra 8

191 Sukta
12 Mantra
1/93/8
Devata- अग्नीषोमौ Rishi- गोतमो राहूगणपुत्रः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो अ॒ग्नीषोमा॑ ह॒विषा॑ सप॒र्याद्दे॑व॒द्रीचा॒ मन॑सा॒ यो घृ॒तेन॑। तस्य॑ व्र॒तं र॑क्षतं पा॒तमंह॑सो वि॒शे जना॑य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छतम् ॥

यः । अ॒ग्नीषोमा॑ । ह॒विषा॑ । स॒प॒र्यात् । दे॒व॒द्रीचा॑ । मन॑सा । यः । घृ॒तेन॑ । तस्य॑ । व्र॒तम् । र॒क्ष॒त॒म् । पा॒तम् । अंह॑सः । वि॒शे । जना॑य । महि॑ । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
यो अग्नीषोमा हविषा सपर्याद्देवद्रीचा मनसा यो घृतेन। तस्य व्रतं रक्षतं पातमंहसो विशे जनाय महि शर्म यच्छतम् ॥

यः। अग्नीषोमा। हविषा। सपर्यात्। देवद्रीचा। मनसा। यः। घृतेन। तस्य। व्रतम्। रक्षतम्। पातम्। अंहसः। विशे। जनाय। महि। शर्म। यच्छतम् ॥ १.९३.८

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 29 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो विद्वान् मनुष्य (देवद्रीचा) उत्तम विद्वानों का सत्कार करते हुए (मनसा) मन से वा (घृतेन) घी और जल तथा (हविषा) अच्छे संस्कार किये हुए हवि से (अग्निषोमा) वायु और अग्नि को (सपर्यात्) सेवे और (यः) जो क्रिया करनेवाला मनुष्य इनके गुणों को जाने (तस्य) उन दोनों के (व्रतम्) सत्यभाषण आदि शील की ये दोनों (रक्षतम्) रक्षा करते (अंहसः) क्षुधा और ज्वर आदि रोग से (पातम्) नष्ट होने से बचाते (विशे) प्रजा और (जनाय) सेवक जन के लिये (महि) अत्यन्त प्रशंसा करने योग्य (शर्म्म) सुख वा घर को (यच्छतम्) देते हैं ॥ ८ ॥
Essence
जो मनुष्य अग्निहोत्र आदि काम से वायु और वर्षा की शुद्धि द्वारा सब वस्तुओं को पवित्र करता है, वह सब प्राणियों को सुख देता है ॥ ८ ॥
Subject
ऐसे उत्तमता से काम में लाये हुए ये दोनों क्या करते हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।