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Rigveda Mandal 1 / Sukta 93 / Mantra 6

191 Sukta
12 Mantra
1/93/6
Devata- अग्नीषोमौ Rishi- गोतमो राहूगणपुत्रः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आन्यं दि॒वो मा॑त॒रिश्वा॑ जभा॒राम॑थ्नाद॒न्यं परि॑ श्ये॒नो अद्रे॑:। अग्नी॑षोमा॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒नोरुं य॒ज्ञाय॑ चक्रथुरु लो॒कम् ॥

आ । अ॒न्यम् । दि॒वः । मा॒त॒रिश्वा॑ । ज॒भा॒र॒ । अम॑थ्नात् । अ॒न्यम् । परि॑ । श्ये॒नः । अद्रेः॑ । अग्नी॑षोमा । ब्रह्म॑णा । व॒वृ॒धा॒ना । उ॒रुम् । य॒ज्ञाय॑ । च॒क्र॒थुः॒ । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् ॥

Mantra without Swara
आन्यं दिवो मातरिश्वा जभारामथ्नादन्यं परि श्येनो अद्रे:। अग्नीषोमा ब्रह्मणा वावृधानोरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकम् ॥

आ। अन्यम्। दिवः। मातरिश्वा। जभार। अमथ्नात्। अन्यम्। परि। श्येनः। अद्रेः। अग्नीषोमा। ब्रह्मणा। ववृधाना। उरुम्। यज्ञाय। चक्रथुः। ऊँ इति। लोकम् ॥ १.९३.६

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 28 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो (ब्रह्मणा) परमेश्वर से (वावृधाना) उन्नति को प्राप्त हुए (अग्नीषोमा) अग्नि और पवन (यज्ञाय) ज्ञान और क्रियामय यज्ञ के लिये (उरुम्) बहुत प्रकार (लोकम्) जो देखा जाता है, उस लोकसमूह को (चक्रथुः) प्रकट करते हैं, उनमें से (मातरिश्वा) पवन जो कि आकाश में सोनेवाला है, वह (दिवः) सूर्य्य आदि लोक से (अन्यम्) और दूसरा अप्रसिद्ध जो कारणलोक है, उसको (आ, जभार) धारण करता है तथा (श्येनः) वेगवान् घोड़े के समान वर्त्तनेवाला अग्नि (अद्रेः) मेघ से (अमथ्नात्) मथा करता है, उनको जानकर उपयोग में लाओ ॥ ६ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो पवन और बिजुली के दो रूप हैं, एक कारण और दूसरा कार्य्य, उनसे जो पहिला है वह विशेष ज्ञान से जानने योग्य और जो दूसरा है वह प्रत्यक्ष इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य है। जिसके गुण और उपकार जाने हैं, उस पवन वा अग्नि से कारणरूप में उक्त अग्नि और पवन प्रवेश करते हैं, यही सुगम मार्ग है जो कार्य के द्वारा कारण में प्रवेश होता है, ऐसा जानो ॥ ६ ॥
Subject
फिर वे क्या करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।