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Rigveda Mandal 1 / Sukta 93 / Mantra 3

191 Sukta
12 Mantra
1/93/3
Devata- अग्नीषोमौ Rishi- गोतमो राहूगणपुत्रः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अग्नी॑षोमा॒ य आहु॑तिं॒ यो वां॒ दाशा॑द्ध॒विष्कृ॑तिम्। स प्र॒जया॑ सु॒वीर्यं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नवत् ॥

अग्नी॑षोमा । यः । आहु॑तिम् । यः । वा॒म् । दासा॑त् । ह॒विःऽकृ॑तिम् । सः । प्र॒ऽजया॑ । सु॒ऽवीर्य॑म् । विश्व॑म् । आयुः॑ । वि । अ॒श्न॒व॒त् ॥

Mantra without Swara
अग्नीषोमा य आहुतिं यो वां दाशाद्धविष्कृतिम्। स प्रजया सुवीर्यं विश्वमायुर्व्यश्नवत् ॥

अग्नीषोमा। यः। आहुतिम्। यः। वाम्। दाशात्। हविःऽकृतिम्। सः। प्रऽजया। सुऽवीर्यम्। विश्वम्। आयुः। वि। अश्नवत् ॥ १.९३.३

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 28 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) सबके हित को चाहनेवाला और (यः) जो यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य (अग्नीषोमा) भौतिक अग्नि और पवन (वाम्) इन दोनों के बीच (हविष्कृतिम्) होम करने के योग्य पदार्थ का कारणरूप (आहुतिम्) घृत आदि उत्तम-उत्तम सुगन्धितादि पदार्थों से युक्त आहुति को (दाशात्) देवे (सः) वह (प्रजया) उत्तम-उत्तम सन्तानयुक्त प्रजा से (सुवीर्य्यम्) श्रेष्ठ पराक्रमयुक्त (विश्वम्) समग्र (आयुः) आयुर्दा को (व्यश्नवत्) प्राप्त होवे ॥ ३ ॥
Essence
जो विद्वान् वायु, वृष्टि, जल और ओषधियों की शुद्धि के लिये अच्छे संस्कार किये हुए हवि को अग्नि के बीच होम के श्रेष्ठ सोमलतादि ओषधियों की प्राप्ति कर उनसे प्राणियों को सुख देते हैं, वे शरीर आत्मा के बल से युक्त होते हुए पूर्ण सुख करनेवाली आयु को प्राप्त होते हैं, अन्य नहीं ॥ ३ ॥
Subject
अब उक्त अग्नि, सोम शब्दों से भौतिक सम्बन्धी कार्यों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।