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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 9

191 Sukta
18 Mantra
1/92/9
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वा॑नि दे॒वी भुव॑नाभि॒चक्ष्या॑ प्रती॒ची चक्षु॑रुर्वि॒या वि भा॑ति। विश्वं॑ जी॒वं च॒रसे॑ बो॒धय॑न्ती॒ विश्व॑स्य॒ वाच॑मविदन्मना॒योः ॥

विश्वा॑नि । दे॒वी । भुव॑ना । अ॒भि॒ऽचक्ष्य॑ । प्र॒ती॒ची । चक्षुः॑ । उ॒र्वि॒या । वि । भा॒ति॒ । विश्व॑म् । जी॒वम् । च॒रसे॑ । बो॒धय॑न्ती । विश्व॑स्य । वाच॑म् । अ॒वि॒द॒त् । म॒ना॒योः ॥

Mantra without Swara
विश्वानि देवी भुवनाभिचक्ष्या प्रतीची चक्षुरुर्विया वि भाति। विश्वं जीवं चरसे बोधयन्ती विश्वस्य वाचमविदन्मनायोः ॥

विश्वानि। देवी। भुवना। अभिऽचक्ष्य। प्रतीची। चक्षुः। उर्विया। वि। भाति। विश्वम्। जीवम्। चरसे। बोधयन्ती। विश्वस्य। वाचम्। अविदत्। मनायोः ॥ १.९२.९

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 25 Mantra » 4

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Meaning
हे स्त्रि ! जैसे (प्रतीची) सूर्य की चाल से परे को ही जाती और (चरसे) व्यवहार करने वा सुख और दुःख भोगने के लिये (विश्वम्) सब (जीवम्) जीवों को (बोधयन्ती) चिताती हुई (देवी) प्रकाश को प्राप्त (उषाः) प्रातःसमय की वेला (मनायोः) मान के समान आचरण करनेवाले (विश्वस्य) जीवमात्र की (वाचम्) वाणी को (अविदत्) प्राप्त होती (चक्षुः) और आँखों के समान सब वस्तु के दिखाई पड़ने का निदान (विश्वानि) समस्त (भुवना) लोकों को (अभिचक्ष्य) सब प्रकार से प्रकाशित करती हुई (उर्विया) पृथिवी के साथ (बिभाति) अच्छे प्रकार प्रकाशित होती है, वैसी तू भी हो ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम स्त्री सब प्रकार से अपने पति को आनन्दित करती है, वैसे प्रातःकाल की वेला समस्त जगत् को आनन्द देती है ॥ ९ ॥
Subject
फिर वह कैसी है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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