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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 7

191 Sukta
18 Mantra
1/92/7
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भास्व॑ती ने॒त्री सू॒नृता॑नां दि॒वः स्त॑वे दुहि॒ता गोत॑मेभिः। प्र॒जाव॑तो नृ॒वतो॒ अश्व॑बुध्या॒नुषो॒ गोअ॑ग्राँ॒ उप॑ मासि॒ वाजा॑न् ॥

भास्व॑ती । ने॒त्री । सू॒नृता॑नाम् । दि॒वः । स्त॒वे॒ । दु॒हि॒ता । गोत॑मेभिः । प्र॒जाऽव॑तः । नृ॒ऽवतः॑ । अश्व॑ऽबुध्यान् । उषः॑ । गोऽअ॑ग्रान् । उप॑ । मा॒सि॒ । वाजा॑न् ॥

Mantra without Swara
भास्वती नेत्री सूनृतानां दिवः स्तवे दुहिता गोतमेभिः। प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्राँ उप मासि वाजान् ॥

भास्वती। नेत्री। सूनृतानाम्। दिवः। स्तवे। दुहिता। गोतमेभिः। प्रजाऽवतः। नृऽवतः। अश्वऽबुध्यान्। उषः। गोऽअग्रान्। उप। मासि। वाजान् ॥ १.९२.७

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 25 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे (सूनृतानाम्) अच्छे-अच्छे काम वा अन्न आदि पदार्थों को (भास्वती) प्रकाशित (नेत्री) और मनुष्यों को व्यवहारों की प्राप्ति कराती वा (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य की (दुहिता) कन्या के समान (उषः) प्रातःसमय की वेला (गोतमेभिः) समस्त विद्याओं को अच्छे प्रकार कहने-सुननेवाले विद्वानों से स्तुति की जाती है, वैसे इसकी मैं (स्तवे) प्रशंसा करूँ। हे स्त्री ! जैसे यह उषा (प्रजावतः) प्रशंसित प्रजायुक्त (नृवतः) वा सेना आदि कामों के बहुत नायकों से युक्त (अश्वबुध्यान्) जिनसे वेगवान् घोड़ों को बार-बार चैतन्य करें (गोअग्रान्) जिनसे राज्य भूमि आदि पदार्थ मिलें, उन (वाजान्) संग्रामों को (उपमासि) समीप प्राप्त कराती है अर्थात् जैसे प्रातःकाल की वेला से अन्धकार का नाश होकर सब प्रकार के पदार्थ प्रकाशित होते हैं, वैसी तू भी हो ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब गुणों से युक्त सुलक्ष्णा कन्या से पिता, माता, चाचा आदि सुखी होते हैं, वैसे ही प्रातःकाल की वेला के गुण-अपगुण प्रकाशित करनेवाली विद्या से विद्वान् लोग सुखी होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह कैसी है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।