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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 6

191 Sukta
18 Mantra
1/92/6
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अता॑रिष्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्योषा उ॒च्छन्ती॑ व॒युना॑ कृणोति। श्रि॒ये छन्दो॒ न स्म॑यते विभा॒ती सु॒प्रती॑का सौमन॒साया॑जीगः ॥

अता॑रिष्म । तम॑सः । पा॒रम् । अ॒स्य । उ॒षाः । उ॒च्छन्ती॑ । व॒युना॑ । कृ॒णो॒ति॒ । श्रि॒ये । छन्दः॑ । न । स्म॒य॒ते॒ । वि॒ऽभा॒ती । सु॒ऽप्रती॑का । सौ॒म॒न॒साय॑ । अ॒जी॒ग॒रिति॑ ॥

Mantra without Swara
अतारिष्म तमसस्पारमस्योषा उच्छन्ती वयुना कृणोति। श्रिये छन्दो न स्मयते विभाती सुप्रतीका सौमनसायाजीगः ॥

अतारिष्म। तमसः। पारम्। अस्य। उषाः। उच्छन्ती। वयुना। कृणोति। श्रिये। छन्दः। न। स्मयते। विऽभाती। सुऽप्रतीका। सौमनसाय। अजीगरिति ॥ १.९२.६

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (श्रिये) विद्या और राज्य की प्राप्ति के लिये (छन्दः) वेदों के (न) समान (उच्छन्ती) अन्धकार को दूर करती और (विभाती) विविध प्रकार के मूर्त्तिमान् पदार्थों को प्रकाशित और (सुप्रतीका) पदार्थों की प्रतीति कराती है वह (उषाः) प्रातःकाल की वेला सब (सौमनसाय) धार्मिक जनों के मनोरञ्जन के लिये (वयुनानि) प्रशंसनीय वा मनोहर कामों को (कृणोति) कराती (अजीगः) अन्धकार को निगल जाती और (स्मयते) आनन्द देती है, उससे (अस्य) इस (तमसः) अन्धकार के (पारम्) पार को प्राप्त होते हैं, वैसे दुःख के परे आनन्द को हम (अतारिष्म) प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे यह उषा प्रातःकाल की वेला कर्म, ज्ञान, आनन्द, पुरुषार्थ, धनप्राप्ति के द्वारा दुःखरूपी अन्धकार के निवारण का निदान है, वैसे इस वेला में उत्तम पुरुषार्थ से प्रयत्न में स्थित होके सुख की बढ़ती और दुःख का नाश करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर वह कैसी है और इससे जीव क्या करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।