Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 3

191 Sukta
18 Mantra
1/92/3
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अर्च॑न्ति॒ नारी॑र॒पसो॒ न वि॒ष्टिभि॑: समा॒नेन॒ योज॑ने॒ना प॑रा॒वत॑:। इषं॒ वह॑न्तीः सु॒कृते॑ सु॒दान॑वे॒ विश्वेदह॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥

अर्च॑न्ति । नारीः॑ । अ॒पसः॑ । न । वि॒ष्टिऽभिः॑ । स॒मा॒नेन॑ । योज॑नेन । आ । प॒रा॒ऽवतः॑ । इष॒म् । वह॑न्तीः । सु॒ऽकृते॑ । सु॒ऽदान॑वे । विश्वा॑ । इत् । अह॑ । यज॑मानाय । सु॒न्व॒ते ॥

Mantra without Swara
अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभि: समानेन योजनेना परावत:। इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते ॥

अर्चन्ति। नारीः। अपसः। न। विष्टिऽभिः। समानेन। योजनेन। आ। पराऽवतः। इषम्। वहन्तीः। सुऽकृते। सुऽदानवे। विश्वा। इत्। अह। यजमानाय। सुन्वते ॥ १.९२.३

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 24 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
सूर्य की किरणें (विष्टिभिः) अपनी व्याप्तियों से (समानेन) समान (योजनेन) योग से अर्थात् सब पदार्थों में एक सी व्याप्त होकर (परावतः) दूरदेश से (न) जैसे (नारीः) पुरुषों के अनुकूल स्त्रियाँ (सुकृते) धर्मिष्ठ (सुदानवे) उत्तम दाता (सुन्वते) ओषधि आदि पदार्थों के रस निकालकर सेवनकर्त्ता (यजमानाय) और पुरुषार्थी पुरुष के लिये (विश्वा) समस्त उत्तम-उत्तम (अपसः) कर्मों और (इषम्) अन्नादि पदार्थों को (आवहन्तीः) अच्छे प्रकार प्राप्त करती हुई उनके (अह) दुःखों के विनाश से (अर्चन्ति) सत्कार करती हैं वैसे उषा भी है, उनका सेवन यथायोग्य सबको करना चाहिये ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने-अपने पति का सेवन कर उनका सत्कार करती हैं, वैसे ही सूर्य की किरणें भूमि को प्राप्त हुई वहाँ से निवृत्त हो और अन्तरिक्ष में प्रकाश प्रकट कर समस्त वस्तुओं को पुष्ट करके सब प्राणियों को सुख देती हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर वे क्या करती हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।