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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 18

191 Sukta
18 Mantra
1/92/18
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
एह दे॒वा म॑यो॒भुवा॑ द॒स्रा हिर॑ण्यवर्तनी। उ॒ष॒र्बुधो॑ वहन्तु॒ सोम॑पीतये ॥

आ । इ॒ह । दे॒वा । म॒यः॒ऽभुवा॑ । द॒स्रा । हिर॑ण्यवर्तनी॒ इति॒ हिर॑ण्यऽवर्तनी । उ॒षः॒ऽबुधः॑ । व॒ह॒न्तु॒ । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
एह देवा मयोभुवा दस्रा हिरण्यवर्तनी। उषर्बुधो वहन्तु सोमपीतये ॥

आ। इह। देवा। मयःऽभुवा। दस्रा। हिरण्यवर्तनी इति हिरण्यऽवर्तनी। उषःऽबुधः। वहन्तु। सोमऽपीतये ॥ १.९२.१८

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 27 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग जो (देवा) दिव्यगुणयुक्त (मयोभुवा) सुख की भावना करानेहारे (हिरण्यवर्त्तनी) प्रकाश के वर्त्ताव को रखते और (दस्रा) विद्या के उपयोग को प्राप्त हुए समस्त दुःख का विनाश करनेवाले अग्नि, पवन (उषर्बुधः) प्रातःकाल की वेला को जतानेहारी सूर्य्य की किरणों को प्रकट करते हैं, उनसे (सोमपीतये) जिस व्यवहार में पुष्टि, शान्त्यादि तथा गुणवाले पदार्थों का पान किया जाता है, उसके लिये सब मनुष्यों को सामर्थ्य (इह) इस संसार में (आवहन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त करावें ॥ १८ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि उत्पन्न हुए दिनों में भी अग्नि और पवन के विना पदार्थ भोगना नहीं हो सकता, इससे अग्नि और पवन से उपयोग लेने का पुरुषार्थ नित्य करें ॥ १८ ॥इस सूक्त में उषा और अश्वि पदार्थों के गुणों के वर्णन से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ इस सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह ९२ बानवाँ सूक्त और २७ सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वे अग्नि और पवन कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।