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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 16

191 Sukta
18 Mantra
1/92/16
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अश्वि॑ना व॒र्तिर॒स्मदा गोम॑द्दस्रा॒ हिर॑ण्यवत्। अ॒र्वाग्रथं॒ सम॑नसा॒ नि य॑च्छतम् ॥

अश्वि॑ना । व॒र्तिः । अ॒स्मत् । आ । गोऽम॑त् । द॒स्रा॒ । हिर॑ण्यऽवत् । अ॒र्वाक् । रथ॑म् । सऽम॑नसा । नि । य॒च्छ॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत्। अर्वाग्रथं समनसा नि यच्छतम् ॥

अश्विना। वर्तिः। अस्मत्। आ। गोऽमत्। दस्रा। हिरण्यऽवत्। अर्वाक्। रथम्। सऽमनसा। नि। यच्छतम् ॥ १.९२.१६

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 27 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग जो (दस्रा) कला-कौशलादि निमित्त से दुःख आदि की निवृत्ति करनेहारे (समनसा) एक से विचार के साथ वर्त्तमान के तुल्य (अश्विना) अग्नि, जल (अस्मत्) हम लोगों के (गोमत्) जिसमें इन्द्रियाँ प्रशंसित होतीं वा (हिरण्यवत्) प्रशंसित सुवर्ण आदि पदार्थ वा विद्या आदि गुणों के प्रकाश विद्यमान वा (वर्त्तिः) आने-जाने के काम में वर्त्तमान उस (अर्वाक्) नीचे अर्थात् जल, स्थलों तथा अन्तरिक्ष में (रथम्) रमण करानेवाले विमान आदि रथसमूह को (न्यायच्छतम्) अच्छे प्रकार नियम में रखते हैं, वे उषःकाल से युक्त अग्नि, जल तथा उनसे युक्त उक्त रथसमूह को प्रतिदिन सिद्ध करते हैं, वैसे तुम लोग भी सिद्ध करो ॥ १६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन क्रिया और चतुराई तथा अग्नि और जल आदि की उत्तेजना से विमान आदि यानों को सिद्ध करके नित्य उन्नति को प्राप्त होनेवाले धन को प्राप्त होकर सुखयुक्त हों ॥ १६ ॥
Subject
फिर उससे क्या करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।