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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 15

191 Sukta
18 Mantra
1/92/15
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्परोष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यु॒क्ष्वा हि वा॑जिनीव॒त्यश्वाँ॑ अ॒द्यारु॒णाँ उ॑षः। अथा॑ नो॒ विश्वा॒ सौभ॑गा॒न्या व॑ह ॥

यु॒क्ष्व । हि । वा॒जि॒नी॒ऽव॒ति॒ । अश्वा॑न् । अ॒द्य । अ॒रु॒णान् । उ॒षः॒ । अथ॑ । नः॒ । विश्वा॑ । सौभ॑गानि । आ । व॒ह॒ ॥

Mantra without Swara
युक्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वाँ अद्यारुणाँ उषः। अथा नो विश्वा सौभगान्या वह ॥

युक्ष्व। हि। वाजिनीऽवति। अश्वान्। अद्य। अरुणान्। उषः। अथ। नः। विश्वा। सौभगानि। आ। वह ॥ १.९२.१५

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 5

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Meaning
हे स्त्रि ! जैसे (वाजिनीवति) जिसमें ज्ञान वा गमन करानेवाली क्रिया हैं, वह (उषः) प्रातःसमय की वेला (अरुणान्) लाल (अश्वान्) चमचमाती फैलती हुई किरणों का (युक्ष्व) संयोग करती है, (अथ) पीछे (नः) हम लोगों के लिये (विश्वा) समस्त (सौभगानि) सौभाग्यपन के कामों को अच्छे प्रकार प्राप्त कराती (हि) ही है, वैसे (अद्य) आज तू शुभगुणों से युक्त और (आवह) सब ओर से प्राप्तकर ॥ १५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। प्रतिदिन निरन्तर पुरुषार्थ के विना मनुष्यों को ऐश्वर्य्य की प्राप्ति नहीं होती, इससे उनको चाहिये कि ऐसा पुरुषार्थ नित्य करें, जिससे ऐश्वर्य बढ़े ॥ १५ ॥
Subject
फिर वह क्या करती है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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