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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 14

191 Sukta
18 Mantra
1/92/14
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्परोष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उषो॑ अ॒द्येह गो॑म॒त्यश्वा॑वति विभावरि। रे॒वद॒स्मे व्यु॑च्छ सूनृतावति ॥

उषः॑ । अ॒द्य । इ॒ह । गो॒ऽम॒ति॒ । अश्व॑ऽवति । वि॒भा॒ऽव॒रि॒ । रे॒वत् । अ॒स्मे । वि । उ॒च्छ॒ । सू॒नृ॒ता॒ऽव॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि। रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति ॥

उषः। अद्य। इह। गोऽमति। अश्वऽवति। विभाऽवरि। रेवत्। अस्मे। वि। उच्छ। सूनृताऽवति ॥ १.९२.१४

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री ! जैसे (गोमति) जिसके सम्बन्ध में गौ होतीं (अश्वावति) घोड़े होते तथा (सूनृतावति) जिसके प्रशंसनीय काम हैं, वह (विभावरि) क्षण-क्षण बढ़ती हुई दीप्तिवाली (उषः) प्रातःसमय की वेला (अस्मे) हम लोगों के लिये (रेवत्) जिसमें प्रशंसित धन हों उस सुख को (वि, उच्छ) प्राप्त कराती है, उससे हम लोग (अद्य) आज (इह) इस जगत् में सुखों को (धामहे) धारण करते हैं ॥ १४ ॥
Essence
इस मन्त्र में (धामहे) इस पद की अनुवृत्ति आती है, मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल सोने से उठकर जबतक फिर न सोवें तबतक अर्थात् दिनभर निरालसता से उत्तम यत्न के साथ विद्या, धन और राज्य तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन सब उत्तम-उत्तम पदार्थों को सिद्ध करें ॥ १४ ॥
Subject
फिर वह क्या करती है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।