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Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 12

191 Sukta
18 Mantra
1/92/12
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प॒शून्न चि॒त्रा सु॒भगा॑ प्रथा॒ना सिन्धु॒र्न क्षोद॑ उर्वि॒या व्य॑श्वैत्। अमि॑नती॒ दैव्या॑नि व्र॒तानि॒ सूर्य॑स्य चेति र॒श्मिभि॑र्दृशा॒ना ॥

प॒शून् । न । चि॒त्रा । सु॒ऽभगा॑ । प्र॒था॒ना । सिन्धुः॑ । न । क्षोदः॑ । उ॒र्वि॒या । वि । अ॒श्वै॒त् । अमि॑नती । दैव्या॑नि । व्र॒तानि॑ । सूर्य॑स्य । चे॒ति॒ । र॒श्मिऽभिः॑ । दृ॒शा॒ना ॥

Mantra without Swara
पशून्न चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत्। अमिनती दैव्यानि व्रतानि सूर्यस्य चेति रश्मिभिर्दृशाना ॥

पशून्। न। चित्रा। सुऽभगा। प्रथाना। सिन्धुः। न। क्षोदः। उर्विया। वि। अश्वैत्। अमिनती। दैव्यानि। व्रतानि। सूर्यस्य। चेति। रश्मिऽभिः। दृशाना ॥ १.९२.१२

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को चाहिये कि (न) जैसे (पशून्) गाय आदि पशुओं को पाकर वैश्य बढ़ता और (न) जैसे (सुभगा) सुन्दर ऐश्वर्य्य करनेहारी (प्रथाना) तरङ्गों से शब्द करती हुई (सिन्धुः) अति वेगवती नदी (क्षोदः) जल को पाकर बढ़ती है, वैसे सुन्दर ऐश्वर्य्य करानेहारी प्रातःसमय चूँ-चाँ करनेहारे पखेरुओं के शब्दों से शब्दवाली और कोसों फैलती हुई (चित्रा) चित्र-विचित्र प्रातःसमय की वेला (उर्विया) पृथिवी के साथ (सूर्यस्य) मार्त्तण्डमण्डल की (रश्मिभिः) किरणों से (दृशाना) जो देखी जाती है, वह (अमिनती) सब प्रकार से रक्षा करती हुई (दैव्यानि) विद्वानों में प्रसिद्ध (व्रतानि) सत्यपालन आदि कामों को (व्यश्वैत्) व्याप्त हो अर्थात् जिसमें विद्वान् जन नियमों को पालते हैं, वैसे प्रितिदिन अपने नियमों को पालती हुई (चेति) जानी जाती है, उस प्रातःसमय की वेला की विद्या के अनुसार वर्त्ताव रखकर निरन्तर सुखी हों ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पशुओं की प्राप्ति के विना वैश्यलोग वा जल की प्राप्ति के विना नदी-नद आदि अति उत्तम सुख करनेवाले नहीं होते, वैसे प्रातःसमय की वेला के गुण जतानेवाली विद्या और पुरुषार्थ के विना मनुष्य प्रशंसित ऐश्वर्य्यवाले नहीं होते, ऐसा जानना चाहिये ॥ १२ ॥
Subject
फिर वह कैसी है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।