Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 92 / Mantra 11

191 Sukta
18 Mantra
1/92/11
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व्यू॒र्ण्व॒ती दि॒वो अन्ताँ॑ अबो॒ध्यप॒ स्वसा॑रं सनु॒तर्यु॑योति। प्र॒मि॒न॒ती म॑नु॒ष्या॑ यु॒गानि॒ योषा॑ जा॒रस्य॒ चक्ष॑सा॒ वि भा॑ति ॥

वि॒ऽऊ॒र्ण्व॒ती । दि॒वः । अन्ता॑न् । अ॒बो॒धि॒ । अप॑ । स्वसा॑रम् । स॒नु॒तः । यु॒यो॒ति॒ । प्र॒ऽमि॒न॒ती । म॒नु॒ष्या॑ । यु॒गानि॑ । योषा॑ । जा॒रस्य॑ । चक्ष॑सा । वि । भा॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
व्यूर्ण्वती दिवो अन्ताँ अबोध्यप स्वसारं सनुतर्युयोति। प्रमिनती मनुष्या युगानि योषा जारस्य चक्षसा वि भाति ॥

विऽऊर्ण्वती। दिवः। अन्तान्। अबोधि। अप। स्वसारम्। सनुतः। युयोति। प्रऽमिनती। मनुष्या। युगानि। योषा। जारस्य। चक्षसा। वि। भाति ॥ १.९२.११

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो प्रातःकाल की वेला जैसे (योषा) कामिनी स्त्री (जारस्य) व्यभिचारी लम्पट कुमार्गी पुरुष की उमर का नाश करे, वैसे सब आयुर्दा को (सनुतः) निरन्तर (प्रमिनती) नाश करती (स्वसारम्) और अपनी बहिन के समान जो रात्रि है, उसको (व्यूर्ण्वती) ढाँपती हुई (अपयुयोति) उसको दूर करती अर्थात् दिन से अलग करती है और आप (वि) अच्छी प्रकार (भाति) प्रकाशित होती जाती है (चक्षसा) उस प्रातःसमय की वेला के निमित्त उससे दर्शन (दिवः) प्रकाशवान् सूर्य्य के (अन्तान्) समीप के पदार्थों को और (मनुष्या) मनुष्यों के सम्बन्धी (युगानी) वर्षों को (अबोधि) जनाती है, उसका सेवन तुम युक्ति से किया करो ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे व्यभिचारिणी स्त्री जारकर्म करनेहारे पुरुष की उमर का विनाश करती है, वैसे सूर्य्य से सम्बन्ध रखनेहारे अन्धकार की निवृत्ति से दिन को प्रसिद्ध करनेवाली प्रातःकाल की वेला है, ऐसा जानकर रात और दिन के बीच युक्ति के साथ वर्त्ताव वर्त्तकर पूरी आयुर्दा को भोगें ॥ ११ ॥
Subject
फिर वह कैसी है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।