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Rigveda Mandal 1 / Sukta 91 / Mantra 4

191 Sukta
23 Mantra
1/91/4
Devata- सोमः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
या ते॒ धामा॑नि दि॒वि या पृ॑थि॒व्यां या पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु। तेभि॑र्नो॒ विश्वै॑: सु॒मना॒ अहे॑ळ॒न्राज॑न्त्सोम॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय ॥

या । ते॒ । धामा॑नि । दि॒वि । या । पृ॒थि॒व्याम् । या । पर्व॑तेषु । ओष॑धीषु । अ॒प्ऽसु । तेभिः॑ । नः॒ । विश्वैः॑ । सु॒ऽमनाः॑ । अहे॑ळन् । राज॑न् । सो॒म॒ । प्रति॑ । ह॒व्या । गृ॒भा॒य॒ ॥

Mantra without Swara
या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु। तेभिर्नो विश्वै: सुमना अहेळन्राजन्त्सोम प्रति हव्या गृभाय ॥

या। ते। धामानि। दिवि। या। पृथिव्याम्। या। पर्वतेषु। ओषधीषु। अप्ऽसु। तेभिः। नः। विश्वैः। सुऽमनाः। अहेळन्। राजन्। सोम। प्रति। हव्या। गृभाय ॥ १.९१.४

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) सबको उत्पन्न करनेवाले (राजन्) राजा ! (ते) आपके (या) जो (धामानि) नाम, जन्म और स्थान (दिवि) प्रकाशमय सूर्य्य आदि पदार्थ वा दिव्य व्यवहार में वा (या) जो (पृथिव्याम्) पृथिवी में वा (या) जो (पर्वतेषु) पर्वतों वा (ओषधीषु) ओषधियों वा (अप्सु) जलों में है (तेभिः) उन (विश्वैः) सबसे (अहेडन्) अनादर न करते हुए (सुमनाः) उत्तम ज्ञानवाले आप (हव्याः) देने-लेने योग्य कामों को (नः) हमको (प्रति+गृभाय) प्रत्यक्ष ग्रहण कराइये ॥ ४ ॥
Essence
जैसे जगदीश्वर अपनी रची सृष्टि में वेद के द्वारा इस सृष्टि के कामों को दिखाकर सब विद्याओं का प्रकाश करता है, वैसे ही विद्वान् पढ़े हुए अङ्ग और उपाङ्ग सहित वेदों से हस्तक्रिया के साथ कलाओं की चतुराई को दिखाकर सबको समस्त विद्या का ग्रहण करावें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उन दोनों के कैसे काम हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।