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Rigveda Mandal 1 / Sukta 91 / Mantra 18

191 Sukta
23 Mantra
1/91/18
Devata- सोमः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सं ते॒ पयां॑सि॒ समु॑ यन्तु॒ वाजा॒: सं वृष्ण्या॑न्यभिमाति॒षाह॑:। आ॒प्याय॑मानो अ॒मृता॑य सोम दि॒वि श्रवां॑स्युत्त॒मानि॑ धिष्व ॥

सम् । ते॒ । पयां॑सि । सम् । ऊँ॒ इति॑ । य॒न्तु॒ । वाजाः॑ । सम् । वृष्ण्या॑नि । अ॒भि॒मा॒ति॒ऽसहः॑ । आ॒ऽप्याय॑मानः । अ॒मृता॑य । सो॒म॒ । दि॒वि । श्रवां॑सि । उ॒त्ऽत॒मानि॑ । धि॒ष्व॒ ॥

Mantra without Swara
सं ते पयांसि समु यन्तु वाजा: सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाह:। आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व ॥

सम्। ते। पयांसि। सम्। ऊँ इति। यन्तु। वाजाः। सम्। वृष्ण्यानि। अभिमातिऽसहः। आऽप्यायमानः। अमृताय। सोम। दिवि। श्रवांसि। उत्ऽतमानि। धिष्व ॥ १.९१.१८

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 22 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) ऐश्वर्य्य को पहुँचानेवाले विद्वान् ! (ते) आपके जो (वृष्ण्यानि) पराक्रमवाले (पयांसि) जल वा अन्न हम लोगों को (संयन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त हों और (अभिमातिषाहः) जिनसे शत्रुओं को सहें वे (वाजाः) संग्राम (सम्) प्राप्त हों उनसे (दिवि) विद्याप्रकाश में (अमृताय) मोक्ष के लिये (आप्यायमानः) दृढ़ बलवाले आप वा उत्तम रसके लिये दृढ़ बलकारक ओषधिगण (उत्तमानि) अत्यन्त श्रेष्ठ (श्रवांसि) वचनों वा अन्नों को (संधिष्व) धारण कीजिये वा करता है ॥ १८ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि विद्या और पुरुषार्थ से विद्वानों के सङ्ग, ओषधियों के सेवन और प्रयोजन से जो-जो प्रशंसित कर्म, प्रशंसित गुण और श्रेष्ठ पदार्थ प्राप्त होते हैं, उनका धारण और उनकी रक्षा तथा धर्म, कामों को सिद्धकर मोक्ष की सिद्धि करें ॥ १८ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।