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Rigveda Mandal 1 / Sukta 91 / Mantra 12

191 Sukta
23 Mantra
1/91/12
Devata- सोमः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ग॒य॒स्फानो॑ अमीव॒हा व॑सु॒वित्पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः। सु॒मि॒त्रः सो॑म नो भव ॥

ग॒य॒ऽस्फानः॑ । अ॒मी॒व॒ऽहा । व॒सु॒ऽवित् । पु॒ष्टि॒ऽवर्ध॑नः । सु॒ऽमि॒त्रः । सो॒म॒ । नः॒ । भ॒व॒ ॥

Mantra without Swara
गयस्फानो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः। सुमित्रः सोम नो भव ॥

गयऽस्फानः। अमीवऽहा। वसुऽवित्। पुष्टिऽवर्धनः। सुऽमित्रः। सोम। नः। भव ॥ १.९१.१२

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
हे (सोम) परमेश्वर वा विद्वन् ! जिस कारण आप वा यह उत्तमौषध (नः) हम लोगों के (गयस्फानः) प्राणों के बढ़ाने वा (अमीवहा) अविद्या आदि दोषों तथा ज्वर आदि दुःखों के विनाश करने वा (वसुवित्) द्रव्य आदि पदार्थों के ज्ञान कराने वा (सुमित्रः) जिनसे उत्तम कामों के करनेवाले मित्र होते हैं वैसे (पुष्टिवर्द्धनः) शरीर और आत्मा की पुष्टि को बढ़ानेवाले (भव) हूजिये वा यह ओषधिसमूह हम लोगों को यथायोग्य उक्त गुण देनेवाला होवे, इससे आप और यह हम लोगों के सेवने योग्य हैं ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। प्राणियों को ईश्वर और ओषधियों के सेवन और विद्वानों के सङ्ग के विना रोगनाश, बलवृद्धि, पदार्थों का ज्ञान, धन की प्राप्ति तथा मित्रमिलाप नहीं हो सकता, इससे उक्त पदार्थों का यथायोग्य आश्रय और सेवा सबको करनी चाहिये ॥ १२ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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