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Rigveda Mandal 1 / Sukta 91 / Mantra 10

191 Sukta
23 Mantra
1/91/10
Devata- सोमः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि। सोम॒ त्वं नो॑ वृ॒धे भ॑व ॥

इ॒मम् । य॒ज्ञम् । इ॒दम् । वचः॑ । जु॒जु॒षा॒णः । उ॒प॒ऽआग॑हि । सोम॑ । त्वम् । नः॒ । वृ॒धे । भ॒व॒ ॥

Mantra without Swara
इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि। सोम त्वं नो वृधे भव ॥

इमम्। यज्ञम्। इदम्। वचः। जुजुषाणः। उपऽआगहि। सोम। त्वम्। नः। वृधे। भव ॥ १.९१.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) परमेश्वर वा विद्वन् ! जिससे (इमम्) इस (यज्ञम्) विद्या की रक्षा करनेवाले वा शिल्प कर्मों से सिद्ध किये हुए यज्ञ को तथा (इदम्) इस विद्या और धर्मसंयुक्त (वचः) वचन को (जुजुषाणः) प्रीति से सेवन करते हुए (त्वम्) आप (उपागहि) समीप प्राप्त होते हैं वा यह सोम आदि ओषधिगण समीप प्राप्त होता है (नः) हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिये (भव) हूजिये वा उक्त ओषधिगण होवें ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जब विज्ञान से ईश्वर और सेवा तथा कृतज्ञता से विद्वान्, वैद्यकविद्या वा उत्तम क्रिया से ओषधियाँ मिलती हैं, तब मनुष्यों के सब सुख उत्पन्न होते हैं ॥ १० ॥
Subject
फिर वह क्या करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।