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Rigveda Mandal 1 / Sukta 90 / Mantra 7

191 Sukta
9 Mantra
1/90/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑वं॒ रजः॑। मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता ॥

मधु॑ । नक्त॑म् । उ॒त । उ॒षसः॑ । मधु॑ऽमत् । पार्थि॑वम् । रजः॑ । मधु॑ । द्यौः । अ॒स्तु॒ । नः॒ । पि॒ता ॥

Mantra without Swara
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥

मधु। नक्तम्। उत। उषसः। मधुऽमत्। पार्थिवम्। रजः। मधु। द्यौः। अस्तु। नः। पिता ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वानो ! जैसे (नः) हम लोगों के लिये (नक्तम्) रात्रि (मधु) मधुर (उषसः) दिन मधुर गुणवाले (पार्थिवम्) पृथिवी में (रजः) अणु और त्रसरेणु आदि छोटे-छोटे भूमि के कणके (मधुमत्) मधुर गुणों से युक्त सुख करनेवाले (उत) और पिता पालन करनेवाली (द्यौः) सूर्य्य की कान्ति (मधु) मधुर गुणवाली (अस्तु) हो, वैसे तुम लोगों के लिये भी हो ॥ ७ ॥
Essence
पढ़ानेवाले लोगों से जैसे मनुष्यों के लिये पृथिवीस्थ पदार्थ आनन्दायक हों, वैसे सब मनुष्यों को गुण, ज्ञान, और हस्तक्रिया से विद्या का उपयोग करना चाहिए ॥ ७ ॥
Subject
फिर हम किसके लिये किस पुरुषार्थ को करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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