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Rigveda Mandal 1 / Sukta 9 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/9/2
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
एमे॑नं सृजता सु॒ते म॒न्दिमिन्द्रा॑य म॒न्दिने॑। चक्रिं॒ विश्वा॑नि॒ चक्र॑ये॥

आ । ई॒म् । ए॒न॒म् । सृ॒ज॒त॒ । सु॒ते । म॒न्दिम् । इन्द्रा॑य । म॒न्दिने॑ । चक्रि॑म् । विश्वा॑नि । चक्र॑ये ॥

Mantra without Swara
एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने। चक्रिं विश्वानि चक्रये॥

आ। ईम्। एनम्। सृजत। सुते। मन्दिम्। इन्द्राय। मन्दिने। चक्रिम्। विश्वानि। चक्रये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (सुते) उत्पन्न हुए इस संसार में (विश्वानि) सब सुखों के उत्पन्न होने के अर्थ (मन्दिने) ऐश्वर्यप्राप्ति की इच्छा करने तथा (मन्दिम्) आनन्द बढ़ानेवाले (चक्रये) पुरुषार्थ करने के स्वभाव और (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य होनेवाले मनुष्य के लिये (चक्रिम्) शिल्पविद्या से सिद्ध किये हुए साधनों में (एनम्) इन (ईम्) जल और अग्नि को (आसृजत) अति प्रकाशित करो॥२॥
Essence
विद्वानों को उचित है कि इस संसार में पृथिवी से लेके ईश्वरपर्य्यन्त पदार्थों के विशेषज्ञान उत्तम शिल्प विद्या से सब मनुष्यों को उत्तम-उत्तम क्रिया सिखाकर सब सुखों का प्रकाश करना चाहिये॥२॥
Subject
शिल्पविद्या के उत्तम साधन जल और अग्नि का वर्णन अगले मन्त्र में किया है-