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Rigveda Mandal 1 / Sukta 89 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/89/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्यजत्राः। स्थि॒रैरङ्गै॑स्तुष्टु॒वांस॑स्त॒नूभि॒र्व्य॑शेम दे॒वहि॑तं॒ यदायुः॑ ॥

भ॒द्रम् । कर्णे॑भिः । शृ॒णु॒या॒म॒ । दे॒वाः॒ । भ॒द्रम् । प॒श्ये॒म॒ । अ॒क्षऽभिः॑ । य॒ज॒त्राः॒ । स्थि॒रैः । अङ्गैः॑ । तु॒स्तु॒ऽवांसः॑ । त॒नूभिः॑ । वि । अ॒शे॒म॒ । दे॒वऽहि॑तम् । यत् । आयुः॑ ॥

Mantra without Swara
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

भद्रम्। कर्णेभिः। शृणुयाम। देवाः। भद्रम्। पश्येम। अक्षऽभिः। यजत्राः। स्थिरैः। अङ्गैः। तुस्तुऽवांसः। तनूभिः। वि। अशेम। देवऽहितम्। यत्। आयुः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 3

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Meaning
हे (यजत्राः) संगम करनेवाले (देवाः) विद्वानो ! आप लोगों के संग से (तनूभिः) बढ़े हुए बलोंवाले शरीर (स्थिरैः) दृढ़ (अङ्गैः) पुष्ट शिर आदि अङ्ग वा ब्रह्मचर्यादि नियमों से (तुष्टुवांसः) पदार्थों के गुणों की स्तुति करते हुए हम लोग (कर्णेभिः) कानों से (यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक पढ़ना-पढ़ाना है, उसको (शृणुयाम) सुनें-सुनावें (अक्षभिः) बाहरी-भीतरली आँखों से जो (भद्रम्) शरीर और आत्मा का सुख है, उसको (पश्येम) देखें, इस प्रकार उक्त शरीर और अङ्गों से जो (देवहितम्) विद्वानों की हित करनेवाली (आयुः) अवस्था है, उसको (वि) (अशेम) वार-वार प्राप्त होवें ॥ ८ ॥
Essence
विद्वान्, आप्त और सज्जनों के संग के विना कोई सत्यविद्या का वचन सत्य-दर्शन और सत्य व्यवहारमय अवस्था को नहीं पा सकता और न इसके विना किसी का शरीर और आत्मा दृढ़ हो सकता है, इससे सब मनुष्यों को यह उक्त व्यवहार वर्त्तना योग्य है ॥ ८ ॥
Subject
मनुष्यों को ऐसा करके क्या-क्या करना चाहिये, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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