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Rigveda Mandal 1 / Sukta 89 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/89/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः। स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ अरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥

स्व॒स्ति । नः॒ । इन्द्रः॑ । वृ॒द्धऽश्र॑वाः । स्व॒स्ति । नः॒ । पू॒षा । वि॒श्वऽवे॑दाः । स्व॒स्ति । नः॒ । तार्क्ष्यः॑ । अरि॑ष्टऽनेमिः । स्व॒स्ति । नः॒ । बृह॒स्पतिः॑ । द॒धा॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

स्वस्ति। नः। इन्द्रः। वृद्धऽश्रवाः। स्वस्ति। नः। पूषा। विश्वऽवेदाः। स्वस्ति। नः। तार्क्ष्यः। अरिष्टऽनेमिः। स्वस्ति। नः। बृहस्पतिः। दधातु ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(वृद्धश्रवाः) संसार में जिसकी कीर्त्ति वा अन्न आदि सामग्री अति उन्नति को प्राप्त है वह (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् परमेश्वर (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) शरीर के सुख को (दधातु) धारण करावे (विश्ववेदाः) जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, वह (पूषा) पुष्टि करनेवाला परमेश्वर (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) धातुओं की समता के सुख को धारण करावे जो (अरिष्टनेमिः) दुःखों का वज्र के तुल्य विनाश करनेवाला (तार्क्ष्यः) और जानने योग्य परमेश्वर है, वह (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) इन्द्रियों की शान्तिरूप सुख को धारण करावे और जो (बृहस्पतिः) वेदवाणी का प्रभु परमेश्वर है, वह (नः) हम लोगों को (स्वस्ति) विद्या से आत्मा के सुख को धारण करावे ॥ ६ ॥
Essence
ईश्वर की प्रार्थना और अपने पुरुषार्थ के विना किसी को शरीर, इन्द्रिय और आत्मा का परिपूर्ण सुख नहीं होता, इससे उसका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये ॥ ६ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को किस प्रकार ईश्वर की प्रार्थना करके किसकी इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥