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Rigveda Mandal 1 / Sukta 88 / Mantra 6

191 Sukta
6 Mantra
1/88/6
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ए॒षा स्या वो॑ मरुतोऽनुभ॒र्त्री प्रति॑ ष्टोभति वा॒घतो॒ न वाणी॑। अस्तो॑भय॒द्वृथा॑सा॒मनु॑ स्व॒धां गभ॑स्त्योः ॥

ए॒षा । स्या । वः॒ । म॒रु॒तः॒ । अ॒नु॒ऽभ॒र्त्री । प्रति॑ । स्तो॒भ॒ति॒ । वा॒घतः॑ । न । वाणी॑ । अस्तो॑भयत् । वृथा॑ । आ॒सा॒म् । अनु॑ । स्व॒धाम् । गभ॑स्त्योः ॥

Mantra without Swara
एषा स्या वो मरुतोऽनुभर्त्री प्रति ष्टोभति वाघतो न वाणी। अस्तोभयद्वृथासामनु स्वधां गभस्त्योः ॥

एषा। स्या। वः। मरुतः। अनुऽभर्त्री। प्रति। स्तोभति। वाघतः। न। वाणी। अस्तोभयत्। वृथा। आसाम्। अनु। स्वधाम्। गभस्त्योः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 6

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Meaning
हे (मरुतः) मनुष्यो ! तुम लोगों की जो (एषा) यह कही हुई वा (स्या) कहने को है, वह (अनुभर्त्री) इष्ट सुख धारण करानेहारी (वाणी) वाक् (वाघतः) ऋतु-ऋतु में यज्ञ करने-करानेहारे विद्वान् के (न) समान विद्याओं का (प्रति+स्तोभति) प्रतिबन्ध करती अर्थात् प्रत्येक विद्याओं को स्थिर करती हुई (आसाम्) विद्या के कामों को (गभस्त्योः) भुजाओं में (अनु) (स्वधाम्) अपने साधारण सामर्थ्य के अनुकूल प्रतिबन्धन करती है तथा (वृथा) झूँठ व्यवहारों को (अस्तोभयत्) रोक देती है, इस वाणी को आप लोगों से हम सुनें ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे ऋतु-ऋतु में यज्ञ करानेवाले की वाणी यज्ञ कामों का प्रकाश कर दोषों को निवृत्त करती है, वैसे ही विद्वानों की वाणी विद्याओं का प्रकाश कर अविद्या को निवृत्त करती है, इसीसे सब मनुष्यों को विद्वानों के संग का निरन्तर सेवन करना चाहिये ॥ ६ ॥ ।इस सूक्त में मनुष्यों को विद्यासिद्धि के लिये पढ़ने-पढ़ाने की रीति प्रकाशित की है, इस कारण इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥
Subject
अब विद्या ज्ञान चाहनेवाला पुरुष उनमें कैसे वर्त्त कर, क्या ग्रहण करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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