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Rigveda Mandal 1 / Sukta 88 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/88/5
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒तत्त्यन्न योज॑नमचेति स॒स्वर्ह॒ यन्म॑रुतो॒ गोत॑मो वः। पश्य॒न्हिर॑ण्यचक्रा॒नयो॑दंष्ट्रान्वि॒धाव॑तो व॒राहू॑न् ॥

ए॒तत् । त्यत् । न । योज॑नम् । अ॒चे॒ति॒ । स॒स्वः । ह॒ । यत् । म॒रु॒तः॒ । गोत॑मः । वः॒ । पश्य॑न् । हिर॑ण्यऽचक्रान् । अयः॑ऽदंष्ट्रान् । वि॒ऽधाव॑तः । व॒राहू॑न् ॥

Mantra without Swara
एतत्त्यन्न योजनमचेति सस्वर्ह यन्मरुतो गोतमो वः। पश्यन्हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतो वराहून् ॥

एतत्। त्यत्। न। योजनम्। अचेति। सस्वः। ह। यत्। मरुतः। गोतमः। वः। पश्यन्। हिरण्यऽचक्रान्। अयःऽदंष्ट्रान्। विऽधावतः। वराहून् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) मनुष्यो ! तुम (गोतमः) विद्वान् के (न) तुल्य (वः) विद्या का ज्ञान चाहनेवाले तुम लोगों को (यत्) जो (योजनम्) जोड़ने योग्य विमान आदि यान (हिरण्यचक्रान्) जिनके पहियों में सोने का काम वा अति चमक दमक हो, उन (अयोदंष्ट्रान्) बड़ी लोहे की कीलोंवाले (वराहून्) अच्छे शब्दों को करने (विधावतः) न्यारे-न्यारे मार्गों को चलनेवाले विमान आदि रथों को (एतत्) प्रत्यक्ष (पश्यन्) देख के (ह) ही (सस्वः) उपदेश करता है, (त्यत्) वह उसका उपदेश किया हुआ तुम लोगों को (अचेति) चेत करता है, उसको तुम जान के मानो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे अगली-पिछली बातों को जाननेवाला विद्वान् अच्छे-अच्छे काम कर आनन्द को भोगता है, वैसे आप लोग भी विद्या से सिद्ध हुए कामों को करके सुखों को भोगो ॥ ५ ॥
Subject
विद्वान् मनुष्यों को क्या-क्या शिक्षा दे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥