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Rigveda Mandal 1 / Sukta 88 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/88/4
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अहा॑नि॒ गृध्राः॒ पर्या व॒ आगु॑रि॒मां धियं॑ वार्का॒र्यां च॑ दे॒वीम्। ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॒ गोत॑मासो अ॒र्कैरू॒र्ध्वं नु॑नुद्र उत्स॒धिं पिब॑ध्यै ॥

अहा॑नि । गृध्राः॑ । परि॑ । आ । वः॒ । आ । अ॒गुः॒ । इ॒माम् । धिय॑म् । वा॒र्का॒र्याम् । च॒ । दे॒वीम् । ब्रह्म॑ । कृ॒ण्वन्तः॑ । गोत॑मासः । अ॒र्कैः । ऊ॒र्ध्वम् । नु॒नु॒द्रे॒ । उ॒त्स॒ऽधिम् । पिब॑ध्यै ॥

Mantra without Swara
अहानि गृध्राः पर्या व आगुरिमां धियं वार्कार्यां च देवीम्। ब्रह्म कृण्वन्तो गोतमासो अर्कैरूर्ध्वं नुनुद्र उत्सधिं पिबध्यै ॥

अहानि। गृध्राः। परि। आ। वः। आ। अगुः। इमाम्। धियम्। वार्कार्याम्। च। देवीम्। ब्रह्म। कृण्वन्तः। गोतमासः। अर्कैः। ऊर्ध्वम्। नुनुद्रे। उत्सऽधिम्। पिबध्यै ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (गृध्राः) सब प्रकार से अच्छी काङ्क्षा करनेवाले (गोतमासः) अत्यन्त ज्ञानवान् सज्जन (ब्रह्म) धन, अन्न और वेद का पठन (कृण्वन्तः) करते हुए (अर्कैः) वेदमन्त्रों से (अहानि) दिनोंदिन (ऊर्ध्वम्) उत्कर्षता से (पिबध्यै) पीने के लिये (उत्सधिम्) जिस भूमि में कुएं नियत किये जावें, उसके समान (आ+नुनुद्रे) सर्वथा उत्कर्ष होने के लिये (वः) तुम्हारे सामने होकर प्रेरणा करते हैं वे (वार्कार्य्याम्) जल के तुल्य निर्मल होने के योग्य (देवीम्) प्रकाश को प्राप्त होती हुई (इमाम्) इस (धियम्) धारणवती बुद्धि (च) और धन को (परि+आ+अगुः) सब कहीं से अच्छे प्रकार प्राप्त हो के अन्य को प्राप्त कराते हैं, वे सदा सेवा के योग्य हैं ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे ज्ञान गौरव चाहनेवालो ! जैसे मनुष्य पिआस के खोने आदि प्रयोजनों के लिये परिश्रम के साथ कुंआ, बावरी, तालाब आदि खुदा कर अपने-अपने कामों को सिद्ध करते हैं, वैसे आप लोग अत्यन्त पुरुषार्थ और विद्धानों के संग से विद्या के अभ्यास को जैसे चाहिये वैसा करके समस्त विद्या से प्रकाशित उत्तम बुद्धि को पाकर उसके अनुकूल क्रिया को सिद्ध करो ॥ ४ ॥
Subject
फिर भी उक्त विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥