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Rigveda Mandal 1 / Sukta 88 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/88/3
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श्रि॒ये कं वो॒ अधि॑ त॒नूषु॒ वाशी॑र्मे॒धा वना॒ न कृ॑णवन्त ऊ॒र्ध्वा। यु॒ष्मभ्यं॒ कं म॑रुतः सुजातास्तुविद्यु॒म्नासो॑ धनयन्ते॒ अद्रि॑म् ॥

श्रि॒ये । कम् । वः॒ । अधि॑ । त॒नूषु॑ । वाशीः॑ । मे॒धा । वना॑ । न । कृ॒ण॒व॒न्ते॒ । ऊ॒र्ध्वा । यु॒ष्मभ्य॑म् । कम् । म॒रु॒तः॒ । सु॒ऽजा॒ताः॒ । तु॒वि॒ऽद्यु॒म्नासः॑ । ध॒न॒य॒न्ते॒ । अद्रि॑म् ॥

Mantra without Swara
श्रिये कं वो अधि तनूषु वाशीर्मेधा वना न कृणवन्त ऊर्ध्वा। युष्मभ्यं कं मरुतः सुजातास्तुविद्युम्नासो धनयन्ते अद्रिम् ॥

श्रिये। कम्। वः। अधि। तनूषु। वाशीः। मेधा। वना। न। कृणवन्ते। ऊर्ध्वा। युष्मभ्यम्। कम्। मरुतः। सुऽजाताः। तुविऽद्युम्नासः। धनयन्ते। अद्रिम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 3

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Meaning
हे (मरुतः) सभाध्यक्षादि सज्जनो ! जो (वः) तुम्हारे (तनूषु) शरीरों में (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (कम्) सुख (ऊर्ध्वा) अच्छे सुख को प्राप्त करनेवाली (वाशीः) वेदवाणी (मेधा) शुद्ध बुद्धियों को (वना) ऊँचे-ऊँचे बनैले पेड़ों के (न) समान (अधि कृणवन्ते) अधिकृत करते हैं अर्थात् उनके आचरण के लिये अधिकार देते हैं। हे (सुजाताः) विद्यादि श्रेष्ठ गुणों में प्रसिद्ध उक्त सज्जनो ! जो (तुविद्युम्नासः) बहुत विद्या प्रकाशोंवाले महात्मा जन (युष्मभ्यम्) तुम लोगों के लिये (कम्) अत्यन्त सुख जैसे हो वैसे (अद्रिम्) पर्वत के समान (धनयन्ते) बहुत धन प्रकाशित कराते हैं, वे तुम लोगों को सदा सेवने योग्य हैं ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेघ वा कूप जल से सिंचे हुए वन और उपवन, बाग-बगीचे अपने फलों से प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे विद्वान् लोग विद्या और अच्छी शिक्षा करके अपने परिश्रम के फल से सब मनुष्यों को सुखसंयुक्त करते हैं ॥ ३ ॥
Subject
अब सभाध्यक्षादिकों को उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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