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Rigveda Mandal 1 / Sukta 88 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/88/2
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ते॑ऽरु॒णेभि॒र्वर॒मा पि॒शङ्गैः॑ शु॒भे कं या॑न्ति रथ॒तूर्भि॒रश्वैः॑। रु॒क्मो न चि॒त्रः स्वधि॑तीवान्प॒व्या रथ॑स्य जङ्घनन्त॒ भूम॑ ॥

ते । अ॒रु॒णेभिः॑ । वर॑म् । आ । पि॒शङ्गैः॑ । शु॒भे । कम् । या॒न्ति॒ । र॒थ॒तूःऽभिः॑ । अश्वैः॑ । रु॒क्मः । न । चि॒त्रः । स्वधि॑तिऽवान् । प॒व्या । रथ॑स्य । ज॒ङ्घ॒न॒न्त॒ । भूम॑ ॥

Mantra without Swara
तेऽरुणेभिर्वरमा पिशङ्गैः शुभे कं यान्ति रथतूर्भिरश्वैः। रुक्मो न चित्रः स्वधितीवान्पव्या रथस्य जङ्घनन्त भूम ॥

ते। अरुणेभिः। वरम्। आ। पिशङ्गैः। शुभे। कम्। यान्ति। रथतूःऽभिः। अश्वैः। रुक्मः। न। चित्रः। स्वधितिऽवान्। पव्या। रथस्य। जङ्घनन्त। भूम ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 2

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Meaning
जैसे कारीगरी को जाननेहारे विद्वान् लोग (शुभे) उत्तम व्यवहार के लिये (अरुणेभिः) अच्छे प्रकार अग्नि के ताप से लाल (पिशङ्गैः) वा अग्नि और जल के संयोग की उठी हुई भाफों से कुछेक श्वेत (रथतूर्भिः) जो कि विमान आदि रथों को चलानेवाले अर्थात् अति शीघ्र उनको पहुँचाने के कारण आग और पानी की कलों के घररूपी (अश्वैः) घोड़े हैं, उनके साथ (रथस्य) विमान आदि रथ की (पव्या) वज्र के तुल्य पहियों की धार से (स्वधितीवान्) प्रशंसित वज्र से अन्तरिक्ष वायु को काटने (रुक्मः) और उत्तेजना रखनेवाले (चित्रः) शूरता, धीरता, बुद्धिमत्ता आदि गुणों से अद्भुत मनुष्य के (न) समान मार्ग को (जङ्घनन्त) हनन करते और देश-देशान्तर को जाते-आते हैं (ते) वे (वरम्) उत्तम (कम्) सुख को (आयान्ति) चारों ओर से प्राप्त होते हैं, वैसे हम भी (भूम) इसको करके आनन्दित होवें ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शूरवीर अच्छे शस्त्र रखनेवाला पुरुष वेग से जाकर शत्रुओं को मारता है, वैसे मनुष्य वेगवाले रथों पर बैठ देश-देशान्तर को जा-आ के शत्रुओं को जीतते हैं ॥ २ ॥
Subject
उक्त कामों से वे क्या पाते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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