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Rigveda Mandal 1 / Sukta 87 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/87/5
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणपुत्रः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पि॒तुः प्र॒त्नस्य॒ जन्म॑ना वदामसि॒ सोम॑स्य जि॒ह्वा प्र जि॑गाति॒ चक्ष॑सा। यदी॒मिन्द्रं॒ शम्यृक्वा॑ण॒ आश॒तादिन्नामा॑नि य॒ज्ञिया॑नि दधिरे ॥

पि॒तुः । प्र॒त्नस्य॑ । जन्म॑ना । व॒दा॒म॒सि॒ । सोम॑स्य । जि॒ह्वा । प्र । जि॒गा॒ति॒ । चक्ष॑सा । यत् । ई॒म् । इन्द्र॑म् । शमि॑ । ऋक्वा॑णः । आश॑त । आत् । इत् । नामा॑नि । य॒ज्ञिया॑नि । द॒धि॒रे॒ ॥

Mantra without Swara
पितुः प्रत्नस्य जन्मना वदामसि सोमस्य जिह्वा प्र जिगाति चक्षसा। यदीमिन्द्रं शम्यृक्वाण आशतादिन्नामानि यज्ञियानि दधिरे ॥

पितुः। प्रत्नस्य। जन्मना। वदामसि। सोमस्य। जिह्वा। प्र। जिगाति। चक्षसा। यत्। ईम्। इन्द्रम्। शमि। ऋक्वाणः। आशत। आत्। इत्। नामानि। यज्ञियानि। दधिरे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(ऋक्वाणः) प्रशंसित स्तुतियोंवाले हम लोग (प्रत्नस्य) पुरातन अनादि (पितुः) पालनेहारे जगदीश्वर की व्यवस्था से अपने कर्म्म के अनुसार पाये हुए मनुष्य देह के (जन्मना) जन्म से (सोमस्य) प्रकट संसार के (चक्षसा) दर्शन से जिन (यज्ञियानि) शिल्प आदि कर्मों के योग्य (नामानि) जलों को (वदामसि) तुम्हारे प्रति उपदेश करें वा (यत्) जो (ईम्) प्राप्त होने योग्य (इन्द्रम्) बिजुली अग्नि के तेज को (शमि) कर्म के निमित्त (जिह्वा) जीभ वा वाणी (प्रजिगाति) स्तुति करती है, उन सब को तुम लोग (आशत) प्राप्त होओ और (आत+इत्) उसी समय इनको (दधिरे) सब लोग धारण करो ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि इस मनुष्यदेह को पाकर पितृभाव से परमेश्वर की आज्ञापालन रूप प्रार्थना, उपासना और परमेश्वर का उपदेश, संसार के पदार्थ और उनके विशेष ज्ञान से उपकारों को लेकर अपने जन्म को सफल करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वे क्या करते हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥