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Rigveda Mandal 1 / Sukta 87 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/87/3
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणपुत्रः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्रैषा॒मज्मे॑षु विथु॒रेव॑ रेजते॒ भूमि॒र्यामे॑षु॒ यद्ध॑ यु॒ञ्जते॑ शु॒भे। ते क्री॒ळयो॒ धुन॑यो॒ भ्राज॑दृष्टयः स्व॒यं म॑हि॒त्वं प॑नयन्त॒ धूत॑यः ॥

प्र । ए॒षा॒म् । अज्मे॑षु । वि॒थु॒राऽइ॑व । रे॒ज॒ते॒ । भूमिः॑ । यामे॑षु । यत् । ह॒ । यु॒ञ्जते॑ । शु॒भे । ते । क्री॒ळयः॒ । धुन॑यः । भ्राज॑त्ऽऋष्टयः । स्व॒यम् । म॒हि॒ऽत्वम् । प॒न॒य॒न्त॒ । धूत॑यः ॥

Mantra without Swara
प्रैषामज्मेषु विथुरेव रेजते भूमिर्यामेषु यद्ध युञ्जते शुभे। ते क्रीळयो धुनयो भ्राजदृष्टयः स्वयं महित्वं पनयन्त धूतयः ॥

प्र। एषाम्। अज्मेषु। विथुराऽइव। रेजते। भूमिः। यामेषु। यत्। ह। युञ्जते। शुभे। ते। क्रीळयः। धुनयः। भ्राजत्ऽऋष्टयः। स्वयम्। महिऽत्वम्। पनयन्त। धूतयः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (क्रीळयः) अपने सत्य चालचलन को वर्त्तते हुए (धुनयः) शत्रुओं को कंपावें (भ्राजदृष्टयः) ऐसे तीव्र शस्त्रोंवाले (धूतयः) जो कि युद्ध की क्रियाओं में विचरके वे वीर (शुभे) श्रेष्ठ विजय के लिये (अज्मेषु) संग्रामों में (प्र+युञ्जते) प्रयुक्त अर्थात् प्रेरणा को प्राप्त होते हैं (ते) वे (महित्वम्) बड़प्पन जैसे हो वैसे (स्वयम्) आप (ह) ही (पनयन्त) व्यवहारों को करते हैं (एषाम्) इनके (यामेषु) उन मार्गों में कि जिनमें मनुष्य आदि प्राणी जाते हैं, चलते हुए रथों से (भूमिः) धरती (विथुरा+इव+रेजते) ऐसे कम्पती है कि मानो शीतज्वर से पीड़ित लड़की कंपे ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शीघ्र चलनेवाले पवन वृक्ष, तृण, ओषधि और धूलि को कंपाते हैं, वैसे वीरों की सेना के रथों के पहियों के प्रहार से धरती और उनके शस्त्रों की चोटों से डरनेहारे मनुष्य कंपा करते हैं और जैसे व्यापारवाले मनुष्य व्यवहार से धन को पाकर बड़े धनाढ्य होते हैं, वैसे ही सभा आदि कामों के अधीश शत्रुओं को जीतने से अपना बड़प्पन और प्रतिष्ठा विख्यात करते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥