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Rigveda Mandal 1 / Sukta 87 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/87/2
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणपुत्रः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ॒प॒ह्व॒रेषु॒ यदचि॑ध्वं य॒यिं वय॑इव मरुतः॒ केन॑ चित्प॒था। श्चोत॑न्ति॒ कोशा॒ उप॑ वो॒ रथे॒ष्वा घृ॒तमु॑क्षता॒ मधु॑वर्ण॒मर्च॑ते ॥

उ॒प॒ऽह्व॒रेषु॒ । यत् । अचि॑ध्वम् । य॒यिम् । वयः॑ऽइव । म॒रु॒तः॒ । केन॑ । चि॒त् । प॒था । श्चोत॑न्ति । कोशाः॑ । उप॑ । वः॒ । रथे॑षु । आ । घृ॒तम् । उ॒क्ष॒त॒ । मधु॑ऽवर्ण॑म् । अर्च॑ते ॥

Mantra without Swara
उपह्वरेषु यदचिध्वं ययिं वयइव मरुतः केन चित्पथा। श्चोतन्ति कोशा उप वो रथेष्वा घृतमुक्षता मधुवर्णमर्चते ॥

उपऽह्वरेषु। यत्। अचिध्वम्। ययिम्। वयःऽइव। मरुतः। केन। चित्। पथा। श्चोतन्ति। कोशाः। उप। वः। रथेषु। आ। घृतम्। उक्षत। मधुऽवर्णम्। अर्चते ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) सभा आदि कामों में नियत किये हुए मनुष्यो ! तुम (उपह्वरेषु) प्राप्त हुए टेढ़े-सूधे भूमि आकाशादि मार्गों में (रथेषु) विमान आदि रथों पर बैठ (वयइव) पक्षियों के समान (केनचित्) किसी (पथा) मार्ग से (यत्) जिस (ययिम्) प्राप्त होने योग्य विजय को (अचिध्वम्) सम्पादन करो, जाओ-आओ उसको (अर्चते) जिसका सत्कार करते और सभा आदि कामों के अधीश जिसको प्यारे हैं, उसके लिये देओ, जो (वः) तुम्हारे रथ (कोशाः) मेघों के समान आकाश में (श्चोतन्ति) चलते हैं, उनमें (मधुवर्णम्) मधुर और निर्मल (घृतम्) जल को (उप+आ+उक्षत) अच्छे प्रकार उपसिक्त करो अर्थात् उन रथों की आग और पवन के कलघरों के समीप अच्छे प्रकार छिड़को ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि विमान आदि रथ रचकर उनमें आग, पवन और जल के घरों को बनाकर, उनमें आग, पवन, जल धर कर कलों से उनको चलाकर उनकी भाप रोक रथों को ऊपर ले जायें, जैसे कि पखेरू वा मेघ जाते हैं, वैसे आकाश मार्ग से अभीष्ट स्थान को जा-आकर व्यवहार से धन और युद्ध सर्वथा जीत वा राज्यधन को प्राप्त होकर उन धन आदि पदार्थों से परोपकार कर निरभिमानी होकर सब प्रकार के आनन्द पावें और उन आनन्दों को सबके लिये पहुँचावें ॥ २ ॥
Subject
सभाध्यक्ष के कामवाले मनुष्य क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥