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Rigveda Mandal 1 / Sukta 86 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/86/10
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गूह॑ता॒ गुह्यं॒ तमो॒ वि या॑त॒ विश्व॑म॒त्रिण॑म्। ज्योति॑ष्कर्ता॒ यदु॒श्मसि॑ ॥

गूह॑त । गुह्य॑म् । तमः॑ । वि । या॒त॒ । विश्व॑म् । अ॒त्रिण॑म् । ज्योतिः॑ । क॒र्त॒ । यत् । उ॒श्मसि॑ ॥

Mantra without Swara
गूहता गुह्यं तमो वि यात विश्वमत्रिणम्। ज्योतिष्कर्ता यदुश्मसि ॥

गूहत। गुह्यम्। तमः। वि। यात। विश्वम्। अत्रिणम्। ज्योतिः। कर्त। यत्। उश्मसि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सत्यशवसः) नित्यबलयुक्त सभाध्यक्ष आदि सज्जनो ! जैसे तुम (महित्वना) अपने उत्तम यश से (गुह्यम्) गुप्त करने योग्य व्यवहार को (गूहत) ढांपो और (विश्वम्) समस्त (तमः) अविद्यारूपी अन्धकार को जो कि (अत्रिणम्) उत्तम सुख का विनाश करनेवाला है, उस को (वि यात) दूर पहुँचाओ तथा हम लोग (यत्) जो (ज्योतिः) विद्या के प्रकाश को (उश्मसि) चाहते हैं, उसको (कर्त्त) प्रकट करो ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में (मरुतः, सत्यशवसः, महित्वना) इन तीनों पदों की अनुवृत्ति है। सभाध्यक्षादि को परम पुरुषार्थ से निरन्तर राज्य की रक्षा करनी तथा अविद्यारूपी अन्धकार और शत्रुजन दूर करने चाहिये तथा विद्या, धर्म और सज्जनों के सुखों का प्रचार करना चाहिये ॥ १० ॥ इस सूक्त में जैसे शरीर में ठहरनेहारे प्राण आदि पवन चाहे हुए सुखों को सिद्ध कर सबकी रक्षा करते हैं, वैसे ही सभाध्यक्षादिकों को चाहिये कि समस्त राज्य की यथावत् रक्षा करें। इस अर्थ के वर्णन से इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की उस पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर वे क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥