Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 85 / Mantra 9

191 Sukta
12 Mantra
1/85/9
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वष्टा॒ यद्वज्रं॒ सुकृ॑तं हिर॒ण्ययं॑ स॒हस्र॑भृष्टिं॒ स्वपा॒ अव॑र्तयत्। ध॒त्त इन्द्रो॒ नर्यपां॑सि॒ कर्त॒वेऽह॑न्वृ॒त्रं निर॒पामौ॑ब्जदर्ण॒वम् ॥

त्वष्टा॑ । यत् । वज्र॑म् । सुऽकृ॑तम् । हि॒र॒ण्यय॑म् । स॒हस्र॑ऽभृष्टिम् । सु॒ऽअपाः॑ । अव॑र्तयत् । ध॒त्ते । इन्द्रः॑ । नरि॑ । अपां॑सि । कर्त॑वे । अह॑न् । वृ॒त्रम् । निः । अ॒पाम् । औ॒ब्ज॒त् । अ॒र्ण॒वम् ॥

Mantra without Swara
त्वष्टा यद्वज्रं सुकृतं हिरण्ययं सहस्रभृष्टिं स्वपा अवर्तयत्। धत्त इन्द्रो नर्यपांसि कर्तवेऽहन्वृत्रं निरपामौब्जदर्णवम् ॥

त्वष्टा। यत्। वज्रम्। सुऽकृतम्। हिरण्ययम्। सहस्रऽभृष्टिम्। सुऽअपाः। अवर्तयत्। धत्ते। इन्द्रः। नरि। अपांसि। कर्तवे। अहन्। वृत्रम्। निः। अपाम्। औब्जत्। अर्णवम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
प्रजा और सेना में स्थित पुरुष जैसे (स्वपाः) उत्तम कर्म करता (त्वष्टा) छेदन करनेहारा (इन्द्रः) सूर्य (कर्त्तवे) करने योग्य (अपांसि) कर्मों को और (यत्) जिस (सुकृतम्) अच्छे प्रकार सिद्ध किये (हिरण्ययम्) प्रकाशयुक्त (सहस्रभृष्टिम्) जिससे हजारह पदार्थ पकते हैं, उस (वज्रम्) वज्र का प्रहार करके (वृत्रम्) मेघ का (अहन्) हनन करता है, (अपाम्) जलों के (अर्णवम्) समुद्र को (निरौब्जत्) निरन्तर सरल करता है, वैसे दुष्टों को (पर्यवर्त्तयत्) छिन्न-भिन्न करता हुआ शत्रुओं का हनन करके (नरि) मनुष्यों में श्रेष्ठों को (आधत्ते) धारण करता है, वह राजा होने को योग्य होता है ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य मेघ को धारण और हनन कर वर्षा के समुद्र को भरता है, वैसे सभापति लोग विद्या न्याययुक्त प्रजा के पालन व धारण करके, अविद्या अन्याययुक्त दुष्टों का ताड़न करके, सबके हित के लिये सुखसागर को पूर्ण भरें ॥ ९ ॥
Subject
फिर वे सभाध्यक्ष आदि कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥