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Rigveda Mandal 1 / Sukta 85 / Mantra 8

191 Sukta
12 Mantra
1/85/8
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
शूरा॑इ॒वेद्युयु॑धयो॒ न जग्म॑यः श्रव॒स्यवो॒ न पृत॑नासु येतिरे। भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑ना म॒रुद्भ्यो॒ राजा॑नइव त्वे॒षसं॑दृशो॒ नरः॑ ॥

शूराः॑ऽइव । इत् । युयु॑धयह् । न । जग्म॑यः । श्र॒व॒स्यवः॑ । न । पृत॑नासु । ये॒ति॒रे॒ । भय॑न्ते । विश्वा॑ । भुव॑ना । म॒रुत्ऽभ्यः॑ । राजा॑नःऽइव । त्वे॒षऽस॑न्दृशः । नरः॑ ॥

Mantra without Swara
शूराइवेद्युयुधयो न जग्मयः श्रवस्यवो न पृतनासु येतिरे। भयन्ते विश्वा भुवना मरुद्भ्यो राजानइव त्वेषसंदृशो नरः ॥

शूराःऽइव। इत्। युयुधयः। न। जग्मयः। श्रवस्यवः। न। पृतनासु। येतिरे। भयन्ते। विश्वा। भुवना। मरुत्ऽभ्यः। राजानःऽइव। त्वेषऽसन्दृशः। नरः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो वायु (शूराइव) शूरवीरों के समान (इत्) ही मेघ के साथ (युयुधयो न) युद्ध करनेवाले के समान (जग्मयः) जाने-आनेहारे (पृतनासु) सेनाओं में (श्रवस्यवः) अन्नादि पदार्थों को अपने लिये बढ़ानेहारे के समान (येतिरे) यत्न करते हैं (राजान इव) राजाओं के समान (त्वेषसंदृशः) प्रकाश को दिखानेहारे (नरः) नायक के समान हैं, जिन (मरुद्भ्यः) वायुओं से (विश्वा) सब (भुवना) संसारस्थ प्राणी (भयन्ते) डरते हैं, उन वायुओं का अच्छी युक्ति से उपयोग करो ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे भयरहित पुरुष युद्ध से निवर्त्त नहीं होते, जैसे युद्ध करनेहारे लड़ने के लिये शीघ्र दौड़ते हैं, जैसे क्षुधातुर मनुष्य अन्न की इच्छा और जैसे सेनाओं में युद्ध की इच्छा करते हैं, जैसे दण्ड देनेहारे न्यायाधीशों से अन्यायकारी मनुष्य उद्विग्न होते हैं, वैसे ही कुपथ्यकारी, वायुओं का अच्छे प्रकार उपयोग न करनेहारे मनुष्य वायुओं से भय को प्राप्त होते और अपनी मर्यादा में रहते हैं ॥ ८ ॥
Subject
फिर वे वायु कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥