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Rigveda Mandal 1 / Sukta 85 / Mantra 7

191 Sukta
12 Mantra
1/85/7
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ते॑ऽवर्धन्त॒ स्वत॑वसो महित्व॒ना नाकं॑ त॒स्थुरु॒रु च॑क्रिरे॒ सदः॑। विष्णु॒र्यद्धाव॒द्वृष॑णं मद॒च्युतं॒ वयो॒ न सी॑द॒न्नधि॑ ब॒र्हिषि॑ प्रि॒ये ॥

ते । अ॒व॒र्ध॒न्त॒ । स्वऽत॑वसः । म॒हि॒ऽत्व॒ना । आ । नाक॑म् । त॒स्थुः । उ॒रु । च॒क्रि॒रे॒ । सदः॑ । विष्णुः॑ । यत् । ह॒ । आव॑त् । वृष॑णम् । म॒द॒ऽच्युत॑म् । वयः॑ । न । स्द॒न् । अधि॑ । ब॒र्हिषि॑ । प्रि॒ये ॥

Mantra without Swara
तेऽवर्धन्त स्वतवसो महित्वना नाकं तस्थुरुरु चक्रिरे सदः। विष्णुर्यद्धावद्वृषणं मदच्युतं वयो न सीदन्नधि बर्हिषि प्रिये ॥

ते। अवर्धन्त। स्वऽतवसः। महिऽत्वना। आ। नाकम्। तस्थुः। उरु। चक्रिरे। सदः। विष्णुः। यत्। ह। आवत्। वृषणम्। मदऽच्युतम्। वयः। न। सीदन्। अधि। बर्हिषि। प्रिये ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (विष्णुः) सूर्यवत् शिल्पविद्या में निपुण मनुष्य (प्रिये) अत्यन्त सुन्दर (बर्हिषि) आकाश में (वृषणम्) अग्नि-जल के वर्षायुक्त विमान के (अधिसीदन्) ऊपर बैठ के (वयो न) जैसे पक्षी आकाश में उड़ते और भूमि में आते हैं, वैसे (यत्) जिस (मदच्युतम्) हर्ष को प्राप्त दुष्टों को रोकनेहारे मनुष्यों की (आवत्) रक्षा करता है, उसको जो (स्वतवसः) स्वकीय बलयुक्त मनुष्य प्राप्त होते हैं (ते ह) वे ही (महित्वना) महिमा से (अवर्धन्त) बढ़ते हैं और जो विमानादि यानों में (आतस्थुः) बैठ के (उरु) बहुत सुखसाधक (सदः) स्थान को जाते-आते हैं, वे (नाकम्) विशेष सुख (चक्रिरे) करते हैं ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पक्षी आकाश में सुखपूर्वक जाके आते हैं, वैसे ही साङ्गोपाङ्ग शिल्पविद्या को साक्षात् करके उससे उत्तम यानादि सिद्ध करके अच्छी सामग्री को रख के बढ़ाते हैं, वे ही उत्तम प्रतिष्ठा और धनों को प्राप्त होकर नित्य बढ़ा करते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर वे क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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