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Rigveda Mandal 1 / Sukta 85 / Mantra 5

191 Sukta
12 Mantra
1/85/5
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र यद्रथे॑षु॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वं॒ वाजे॒ अद्रिं॑ मरुतो रं॒हय॑न्तः। उ॒तारु॒षस्य॒ वि ष्य॑न्ति॒ धारा॒श्चर्मे॑वो॒दभि॒र्व्यु॑न्दन्ति॒ भूम॑ ॥

प्र । यत् । रथे॑षु । पृष॑तीः । अयु॑ग्ध्वम् । वाजे॑ । अद्रि॑म् । म॒रु॒तः॒ । रं॒हय॑न्तः । उ॒त । अ॒रु॒षस्य॑ । वि । स्य॒न्ति॒ । धाराः॑ । चर्म॑ऽइव । उ॒दऽभिः॑ । वि । उ॒न्दन्ति॑ । भूम॑ ॥

Mantra without Swara
प्र यद्रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं वाजे अद्रिं मरुतो रंहयन्तः। उतारुषस्य वि ष्यन्ति धाराश्चर्मेवोदभिर्व्युन्दन्ति भूम ॥

प्र। यत्। रथेषु। पृषतीः। अयुग्ध्वम्। वाजे। अद्रिम्। मरुतः। रंहयन्तः। उत। अरुषस्य। वि। स्यन्ति। धाराः। चर्मऽइव। उदऽभिः। वि। उन्दन्ति। भूम ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जैसे विद्वान् शिल्पी लोग (यत्) जिन (रथेषु) विमानादि यानों में (पृषतीः) अग्नि और पवनयुक्त जलों को (प्रयुग्ध्वम्) संयुक्त करें (उत) और (अद्रिम्) मेघ को (रंहयन्तः) अपने वेग से चलाते हुए (मरुतः) पवन जैसे (अरुषस्य) घोड़े के समान (वाजे) युद्ध में (चर्मेव) चमड़े के तुल्य काष्ठ धातु और चमड़े से भी मढ़े कलाघरों में (उद्भिः) जलों से (धाराः) उनके प्रवाहों को (विष्यन्ति) काम की समाप्ति करने के लिये समर्थ करते और (भूम) भूमि को (व्युन्दन्ति) गीली करते अर्थात् रथ को चलाते हुए जल टपकाते जाते हैं, वैसे उन यानों से अन्तरिक्ष मार्ग से देश-देशान्तर और द्वीप-द्वीपान्तर में जा-आ के लक्ष्मी को बढ़ाओ ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जैसे वायु बादलों को संयुक्त करता और चलाता है, वैसे शिल्पि लोग उत्तम शिक्षा और हस्तक्रिया अग्नि आदि अच्छे प्रकार जाने हुए वेगकर्त्ता पदार्थों के योग से स्थानान्तर को प्राप्त हो के कार्यों को सिद्ध करते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर वे कैसे करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥