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Rigveda Mandal 1 / Sukta 85 / Mantra 4

191 Sukta
12 Mantra
1/85/4
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि ये भ्राज॑न्ते॒ सुम॑खास ऋ॒ष्टिभिः॑ प्रच्या॒वय॑न्तो॒ अच्यु॑ता चि॒दोज॑सा। म॒नो॒जुवो॒ यन्म॑रुतो॒ रथे॒ष्वा वृष॑व्रातासः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम् ॥

वि । ये । भ्राज॑न्ते । सुऽम॑खासः । ऋ॒ष्टिऽभिः॑ । प्र॒ऽच्य॒वय॑न्तः । अच्यु॑ता । चि॒त् । ओज॑सा । म॒नः॒ऽजुवः॑ । यत् । म॒रु॒तः॒ । रथे॑षु । आ । वृष॑ऽव्रातासः । पृष॑तीः । अयु॑ग्ध्वम् ॥

Mantra without Swara
वि ये भ्राजन्ते सुमखास ऋष्टिभिः प्रच्यावयन्तो अच्युता चिदोजसा। मनोजुवो यन्मरुतो रथेष्वा वृषव्रातासः पृषतीरयुग्ध्वम् ॥

वि। ये। भ्राजन्ते। सुऽमखासः। ऋष्टिऽभिः। प्रऽच्यावयन्तः। अच्युता। चित्। ओजसा। मनःऽजुवः। यत्। मरुतः। रथेषु। आ। वृषऽव्रातासः। पृषतीः। अयुग्ध्वम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे प्रजा और सभा के मनुष्यो ! (ये) जो (मनोजुवः) मन के समान वेगवाले (मरुतः) वायुओं के (चित्) समान (वृषव्रातासः) शस्त्र और अस्त्रों को शत्रुओं के ऊपर वर्षानेवाले मनुष्यों से युक्त (सुमखासः) उत्तम शिल्पविद्या सम्बन्धी वा संग्रामरूप क्रियाओं के करनेहारे (ऋष्टिभिः) यन्त्र कलाओं को चलानेवाले दण्डों और (अच्युता) अक्षय (ओजसा) बल पराक्रम युक्त सेना से शत्रु की सेनाओं को (प्रच्यावयन्तः) नष्ट-भ्रष्ट करते हुए (व्याभ्राजन्ते) अच्छे प्रकार शोभायमान होते हैं, उनके साथ (यत्) जिन (रथेषु) रथों में (पृषतीः) वायु से युक्त जलों को (अयुग्ध्वम्) संयुक्त करो, उनसे शत्रुओं को जीतो ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्यो को उचित है कि मन के समान वेगयुक्त विमानादि यानों में जल, अग्नि और वायु को संयुक्त कर, उसमें बैठ के, सर्वत्र भूगोल में जा-आके शत्रुओं को जीतकर, प्रजा को उत्तम रीति से पाल के, शिल्पविद्या कर्मों को बढ़ा के सबका उपकार किया करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे क्या-क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥