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Rigveda Mandal 1 / Sukta 85 / Mantra 2

191 Sukta
12 Mantra
1/85/2
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त उ॑क्षि॒तासो॑ महि॒मान॑माशत दि॒वि रु॒द्रासो॒ अधि॑ चक्रिरे॒ सदः॑। अर्च॑न्तो अ॒र्कं ज॒नय॑न्त इन्द्रि॒यमधि॒ श्रियो॑ दधिरे॒ पृश्नि॑मातरः ॥

ते । उ॒क्षि॒तासः॑ । म॒हि॒मान॑म् । आ॒श॒त॒ । दि॒वि । रु॒द्रासः॑ । अधि॑ । च॒क्रि॒रे॒ । सदः॑ । अर्च॑न्तः । अ॒र्कम् । ज॒नय॑न्तः । इ॒न्द्रि॒यम् । अधि॑ । श्रियः॑ । द॒धि॒रे॒ । पृश्नि॑ऽमातरः ॥

Mantra without Swara
त उक्षितासो महिमानमाशत दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः। अर्चन्तो अर्कं जनयन्त इन्द्रियमधि श्रियो दधिरे पृश्निमातरः ॥

ते। उक्षितासः। महिमानम्। आशत। दिवि। रुद्रासः। अधि। चक्रिरे। सदः। अर्चन्तः। अर्कम्। जनयन्तः। इन्द्रियम्। अधि। श्रियः। दधिरे। पृश्निऽमातरः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (उक्षितासः) वृष्टि से पृथ्वी का सेचन करनेहारे (पृश्निमातरः) जिनकी आकाश माता है (ते) वे (रुद्रासः) वायु (दिवि) आकाश में (सदः) स्थिर (महिमानम्) प्रतिष्ठा को (अध्याशत) अधिक प्राप्त होते और उसी को (अधिचक्रिरे) अधिक करते और (इन्द्रियम्) धन को (दधिरे) धारण करते हैं, वैसे (अर्कम्) पूजनीय का (अर्चन्तः) पूजन करते हुए आप लोग (श्रियः) लक्ष्मी को (जनयन्तः) बढ़ा के आनन्दित रहो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु वृष्टि का निमित्त होके उत्तम सुखों को प्राप्त कराते हैं, वैसे सभाध्यक्ष लोग विद्या से सुशिक्षित हो के परस्पर उपकारी और प्रीतियुक्त होवें ॥ २ ॥
Subject
फिर वे कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥