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Rigveda Mandal 1 / Sukta 85 / Mantra 1

191 Sukta
12 Mantra
1/85/1
Devata- मरुतः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र ये शुम्भ॑न्ते॒ जन॑यो॒ न सप्त॑यो॒ याम॑न्रु॒द्रस्य॑ सू॒नवः॑ सु॒दंस॑सः। रोद॑सी॒ हि म॒रुत॑श्चक्रि॒रे वृ॒धे मद॑न्ति वी॒रा वि॒दथे॑षु॒ घृष्व॑यः ॥

प्र । ये । शुम्भ॑न्ते । जन॑यः । न । सप्त॑यः । याम॑न् । रु॒द्रस्य॑ । सू॒नवः॑ । सु॒ऽदंस॑सः । रोद॑सी॒ इति॑ । हि । म॒रुतः॑ । च॒क्रि॒रे । वृ॒धे । मद॑न्ति । वी॒राः । वि॒दथे॑षु । घृष्व॑यः ॥

Mantra without Swara
प्र ये शुम्भन्ते जनयो न सप्तयो यामन्रुद्रस्य सूनवः सुदंससः। रोदसी हि मरुतश्चक्रिरे वृधे मदन्ति वीरा विदथेषु घृष्वयः ॥

प्र। ये। शुम्भन्ते। जनयः। न। सप्तयः। यामन्। रुद्रस्य। सूनवः। सुऽदंससः। रोदसी इति। हि। मरुतः। चक्रिरे। वृधे। मदन्ति। वीराः। विदथेषु। घृष्वयः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 1

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Meaning
(ये) जो (रुद्रस्य) दुष्टों के रुलानेवाले के (सूनवः) पुत्र (सुदंससः) उत्तम कर्म करनेहारे (घृष्वयः) आनन्दयुक्त (वीराः) वीरपुरुष (हि) निश्चय (यामन्) मार्ग में जैसे अलङ्कारों से सुशोभित (जनयः) सुशील स्त्रियों के (न) तुल्य और (सप्तयः) अश्व के समान शीघ्र जाने-आनेहारे (मरुतः) वायु (रोदसी) प्रकाश और पृथ्वी के धारण के समान (वृधे) बढ़ने के अर्थ राज्य का धारण करते (विदथेषु) संग्रामों में विजय को (चक्रिरे) करते हैं, वे (प्र शुम्भन्ते) अच्छे प्रकार शोभायुक्त और (मदन्ति) आनन्द को प्राप्त होते हैं, उनसे तू प्रजा का पालन कर ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे अच्छी शिक्षा और विद्या को प्राप्त हुई पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतियों का अथवा स्त्रीव्रत सदा अपनी स्त्रियों ही से प्रसन्न ऋतुगामी पति लोग अपनी स्त्रियों का सेवन करके सुखी और जैसे सुन्दर बलवान् घोड़े मार्ग में शीघ्र पहुँचा के आनन्दित करते हैं, वैसे धार्मिक राजपुरुष सब प्रजा को आनन्दित किया करें ॥ १ ॥
Subject
फिर वे सेनाध्यक्ष आदि कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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