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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 9

191 Sukta
20 Mantra
1/84/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यश्चि॒द्धि त्वा॑ ब॒हुभ्य॒ आ सु॒तावाँ॑ आ॒विवा॑सति। उ॒ग्रं तत्प॑त्यते शव॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥

यः । चि॒त् । हि । त्वा॒ । ब॒हुऽभ्यः॑ । आ । सु॒तऽवा॑न् । आ॒ऽविवा॑सति । उ॒ग्रम् । तत् । प॒त्य॒ते॒ । शवः॑ । इन्द्रः॑ । अ॒ङ्ग ॥

Mantra without Swara
यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति। उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग ॥

यः। चित्। हि। त्वा। बहुऽभ्यः। आ। सुतऽवान्। आऽविवासति। उग्रम्। तत्। पत्यते। शवः। इन्द्रः। अङ्ग ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अङ्ग) मित्र ! तू जो (सुतावान्) अन्नादि पदार्थों से युक्त (इन्द्रः) परमैश्वर्य का प्रापक (बहुभ्यः) मनुष्यों से (त्वा) तुझको (आविवासति) सेवा करता है, जो शत्रुओं का (उग्रम्) अत्यन्त (शवः) बल (तत्) उसको (चित्) भी (आपत्यते) प्राप्त होता है (तम्) (हि) उसी को राजा मानो ॥ ९ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो शत्रुओं के बल का हनन करके तुमको दुःखों से हटाकर सुखयुक्त करने को समर्थ हो तथा जिसके भय और पराक्रम से शत्रु नष्ट होते हैं, उसे सेनापति करके आनन्द को प्राप्त होओ ॥ ९ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥