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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 5

191 Sukta
20 Mantra
1/84/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निच्रृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑य नू॒नम॑र्चतो॒क्थानि॑ च ब्रवीतन। सु॒ता अ॑मत्सु॒रिन्द॑वो॒ ज्येष्ठं॑ नमस्यता॒ सहः॑ ॥

इन्द्रा॑य । नू॒नम् । अ॒र्च॒त॒ । उ॒क्थानि॑ । च॒ । ब्र॒वी॒त॒न॒ । सु॒ताः । अ॒म॒त्सुः॒ । इन्द॑वः । ज्येष्ठ॑म् । न॒म॒स्य॒त॒ । सहः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन। सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः ॥

इन्द्राय। नूनम्। अर्चत। उक्थानि। च। ब्रवीतन। सुताः। अमत्सुः। इन्दवः। ज्येष्ठम्। नमस्यत। सहः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जिसको (सुताः) सिद्ध (इन्दवः) उत्तम रसीले पदार्थ (अमत्सुः) आनन्दित करें, जिसको (ज्येष्ठम्) उत्तम (सहः) बल प्राप्त हो उस (इन्द्राय) सभाध्यक्ष को (नमस्यत) नमस्कार करो और उसको मुख्य कामों में युक्त करके (नूनम्) निश्चय से (अर्चत) सत्कार करो (उक्थानि) अच्छे-अच्छे वचनों से (ब्रवीतन) उपदेश करो, उससे सत्कारों को (च) भी प्राप्त हो ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जो सबका सत्कार करे, शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होके परोपकारी हो, उसको छोड़ के अन्य को सेनापति आदि अधिकारों में कभी स्थापन न करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर किस प्रकार के सभाध्यक्ष का सत्कार करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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