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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 4

191 Sukta
20 Mantra
1/84/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ॒ममि॑न्द्र सु॒तं पि॑ब॒ ज्येष्ठ॒मम॑र्त्यं॒ मद॑म्। शु॒क्रस्य॑ त्वा॒भ्य॑क्षर॒न्धारा॑ ऋ॒तस्य॒ साद॑ने ॥

इ॒मम् । इ॒न्द्र॒ । सु॒तम् । पि॒ब॒ । ज्येष्ठ॑म् । अम॑र्त्यम् । मद॑म् । शु॒क्रस्य॑ । त्वा॒ । अ॒भि । अ॒क्ष॒र॒न् । धाराः॑ । ऋ॒तस्य॑ । साद॑ने ॥

Mantra without Swara
इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्यं मदम्। शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने ॥

इमम्। इन्द्र। सुतम्। पिब। ज्येष्ठम्। अमर्त्यम्। मदम्। शुक्रस्य। त्वा। अभि। अक्षरन्। धाराः। ऋतस्य। सादने ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) शत्रुओं को विदारण करनेहारे ! जिस (त्वा) तुझे जो (धाराः) वाणी (ऋतस्य) सत्य (शुक्रस्य) पराक्रम के (सदने) स्थान में (अभ्यक्षरन्) प्राप्त करती हैं, उनको प्राप्त होके (इमम्) इस (सुतम्) अच्छे प्रकार से सिद्ध किये उत्तम ओषधियों के रस को (पिब) पी, उससे (ज्येष्ठम्) प्रशंसित (अमर्त्यम्) साधारण मनुष्य को अप्राप्त दिव्यस्वरूप (मदम्) आनन्द को प्राप्त होके शत्रुओं को जीत ॥ ४ ॥
Essence
कोई भी मनुष्य विद्या और अच्छे पान-भोजन के विना पराक्रम को प्राप्त होने को समर्थ नहीं और इसके विना सत्य का विज्ञान और विजय नहीं हो सकता ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह क्या आज्ञा करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥