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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 3

191 Sukta
20 Mantra
1/84/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ ति॑ष्ठ वृत्रह॒न्रथं॑ यु॒क्ता ते॒ ब्रह्म॑णा॒ हरी॑। अ॒र्वा॒चीनं॒ सु ते॒ मनो॒ ग्रावा॑ कृणोतु व॒ग्नुना॑ ॥

आ । ति॒ष्ठ॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । रथ॑म् । यु॒क्ता । ते॒ । ब्रह्म॑णा । हरी॒ इति॑ । अ॒र्वा॒चीन॑म् । सु । ते॒ । मनः॑ । ग्रावा॑ । कृ॒णो॒तु॒ । व॒ग्नुना॑ ॥

Mantra without Swara
आ तिष्ठ वृत्रहन्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी। अर्वाचीनं सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना ॥

आ। तिष्ठ। वृत्रऽहन्। रथम्। युक्ता। ते। ब्रह्मणा। हरी इति। अर्वाचीनम्। सु। ते। मनः। ग्रावा। कृणोतु। वग्नुना ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे (वृत्रहन्) मेघ को सविता के समान शत्रुओं के मारनेहारे शूरवीर ! (ते) तेरे जिस (ब्रह्मणा) अन्नादिसामग्री से युक्त शिल्पि वा सारथि के चलाये हुए (हरी) पदार्थ को पहुँचाने वाले जलाग्नि वा घोड़े (युक्ता) युक्त हैं, उस (अर्वाचीनम्) भूमि, जल के नीचे-ऊपर आदि को जानेवाले (रथम्) रथ में तू (आतिष्ठ) बैठ (ग्रावा) मेघ के समान (वग्नुना) सुन्दर मधुर वाणी में वक्तृत्व को (सुकृणोतु) अच्छे प्रकार कर, उससे (ते) तेरा (मनः) विज्ञान वीरों को अच्छे प्रकार उत्साहित किया करे ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सभापतियों को योग्य है कि सेना में दो प्रकार के अधिकारी रक्खें। उनमें एक सेना को लड़ावे और दूसरा अच्छे भाषणों से योद्धाओं को उत्साहित करे। जब युद्ध हो तब सेनापति अच्छी प्रकार परीक्षा और उत्साह से शत्रुओं के साथ ऐसा युद्ध करावे कि जिससे निश्चित विजय हो और जब युद्ध बन्द हो जाये, तब उपदेशक योद्धा और सब सेवकों को धर्मयुक्त कर्म के उपदेश से अच्छे प्रकार उत्साहित करें, ऐसे करनेहारे मनुष्यों का कभी पराजय नहीं हो सकता ॥ ३ ॥
Subject
फिर सेनापति अपनी सेना के भृत्यों को क्या-क्या आज्ञा देवे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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