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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 20

191 Sukta
20 Mantra
1/84/20
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृदास्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मा ते॒ राधां॑सि॒ मा त॑ ऊ॒तयो॑ वसो॒ऽस्मान्कदा॑ च॒ना द॑भन्। विश्वा॑ च न उपमिमी॒हि मा॑नुष॒ वसू॑नि चर्ष॒णिभ्य॒ आ ॥

मा । ते॒ । राधां॑सि । मा । ते॒ । ऊ॒तयः॑ । वसो॒ इति॑ । अ॒स्मान् । कदा॑ । च॒न । द॒भ॒न् । विश्वा॑ । च॒ । नः॒ । उ॒प॒ऽमि॒मी॒हि । मा॒नु॒ष॒ । वसू॑नि । च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑ । आ ॥

Mantra without Swara
मा ते राधांसि मा त ऊतयो वसोऽस्मान्कदा चना दभन्। विश्वा च न उपमिमीहि मानुष वसूनि चर्षणिभ्य आ ॥

मा। ते। राधांसि। मा। ते। ऊतयः। वसो इति। अस्मान्। कदा। चन। दभन्। विश्वा। च। नः। उपऽमिमीहि। मानुष। वसूनि। चर्षणिऽभ्यः। आ ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वसो) सुख में वास करनेहारे ! (ते) आपके (राधांसि) धन (अस्मान्) हमको (कदाचन) कभी भी (मा दभन्) दुःखदायक न हों (ते) तेरी (ऊतयः) रक्षा (अस्मान्) हमको (मा) मत दुःखदायी होवे। हे (मानुष) मनुष्यस्वभावयुक्त ! जैसे तू (चर्षणिभ्यः) उत्तम मनुष्यों को (विश्वा) विज्ञान आदि सब प्रकार के (वसूनि) धनों को देता है, वैसे हमको भी दे (च) और (नः) हमको विद्वान् धार्मिकों की (आ) सब ओर से (उपमिमीहि) उपमा को प्राप्त कर ॥ २० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही धार्मिक मनुष्य हैं जिनका शरीर, मन और धन सबको सुखी करे, वे ही प्रशंसा के योग्य हैं जो जगत् के उपकार के लिये प्रयत्न करते हैं ॥ २० ॥ इस सूक्त में सेनापति के गुण-वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की संगति पूर्व सूक्तार्थ के संग जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥