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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 14

191 Sukta
20 Mantra
1/84/14
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒च्छन्नश्व॑स्य॒ यच्छिरः॒ पर्व॑ते॒ष्वप॑श्रितम्। तद्वि॑दच्छर्य॒णाव॑ति ॥

इ॒च्छन् । अश्व॑स्य । यत् । शिरः॑ । पर्व॑तेषु । अप॑ऽश्रितम् । तत् । वि॒द॒त् । श॒र्य॒णाऽव॑ति ॥

Mantra without Swara
इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम्। तद्विदच्छर्यणावति ॥

इच्छन्। अश्वस्य। यत्। शिरः। पर्वतेषु। अपऽश्रितम्। तत्। विदत्। शर्यणाऽवति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (इन्द्रः) सूर्य (अश्वस्य) शीघ्रगामी मेघ का (यत्) जो (शर्यणावति) आकाश में (पर्वतेषु) पहाड़ वा मेघों में (अपश्रितम्) आश्रित (शिरः) उत्तमाङ्ग के समान अवयव है, उसको छेदन करता है, वैसे शत्रु की सेना के उत्तमाङ्ग के नाश की (इच्छन्) इच्छा करता हुआ सुखों को सेनापति (विदत्) प्राप्त होवे ॥ १४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य आकाश में रहनेहारे मेघ का छेदन कर भूमि में गिराता है, वैसे पर्वत और किलों में भी रहनेहारे दुष्ट शत्रु का हनन करके भूमि में गिरा देवे, इस प्रकार किये विना राज्य की व्यवस्था स्थिर नहीं हो सकती ॥ १४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥