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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 12

191 Sukta
20 Mantra
1/84/12
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराडास्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ता अ॑स्य॒ नम॑सा॒ सहः॑ सप॒र्यन्ति॒ प्रचे॑तसः। व्र॒तान्य॑स्य सश्चिरे पु॒रूणि॑ पू॒र्वचि॑त्तये॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

ताः । अ॒स्य॒ । नम॑सा । सहः॑ । स॒प॒र्यन्ति॑ । प्रऽचे॑तसः । व्र॒तानि॑ । अ॒स्य॒ । स॒श्चि॒रे॒ । पु॒रूणि॑ । पू॒र्वऽचि॑त्तये । वस्वीः॑ । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

Mantra without Swara
ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः। व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥

ताः। अस्य। नमसा। सहः। सपर्यन्ति। प्रऽचेतसः। व्रतानि। अस्य। सश्चिरे। पुरूणि। पूर्वऽचित्तये। वस्वीः। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे (स्वराज्यम्) अपने राज्य का सत्कार करता हुआ न्यायाधीश सबका पालन करता है, वैसे (अस्य) इस अध्यक्ष के (नमसा) अन्न वा वज्र के साथ वर्त्तमान (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानयुक्त सेना (सहः) बल को (सपर्यन्ति) सेवन करती हैं (याः) जो (अस्य) सेनाध्यक्ष के (पूर्वचित्तये) पूर्वज्ञान के लिये (पुरूणि) बहुत (व्रतानि) सत्यभाषण नियम आदि को (सश्चिरे) प्राप्त होती हैं (ताः) उन (वस्वीः) पृथिवी सम्बन्धियों को देशों के आनन्द भोगने के लिये सेवन करो ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सामग्री बल और अच्छे नियमों के विना बहुत राज्य आदि के सुख नहीं प्राप्त होते, इस हेतु से यम-नियमों के अनुकूल जैसा चाहिये, वैसा इसका विचार करके विजय आदि धर्मयुक्त कर्मों को सिद्ध करें ॥ १२ ॥
Subject
फिर वे क्या करती हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥