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Rigveda Mandal 1 / Sukta 84 / Mantra 10

191 Sukta
20 Mantra
1/84/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराडास्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्वा॒दोरि॒त्था वि॑षू॒वतो॒ मध्वः॑ पिबन्ति गौ॒र्यः॑। या इन्द्रे॑ण स॒याव॑री॒र्वृष्णा॒ मद॑न्ति शो॒भसे॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

स्वा॒दोः । इ॒त्था । वि॒षु॒ऽवतः॑ । मध्वः॑ । पि॒ब॒न्ति॒ । गौ॒र्यः॑ । याः । इन्द्रे॑ण । स॒ऽयाव॑रीः । वृष्णा॑ । मद॑न्ति । शो॒भसे॑ । वस्वीः॑ । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

Mantra without Swara
स्वादोरित्था विषूवतो मध्वः पिबन्ति गौर्यः। या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभसे वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥

स्वादोः। इत्था। विषुऽवतः। मध्वः। पिबन्ति। गौर्यः। याः। इन्द्रेण। सऽयावरीः। वृष्णा। मदन्ति। शोभसे। वस्वीः। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (वृष्णा) सुख के वर्षाने (इन्द्रेण) सूर्य के साथ (सयावरीः) तुल्य गमन करनेवाली (वस्वीः) पृथिवी आदि से सम्बन्ध करनेवाली (गौर्यः) किरणों से (स्वराज्यम्) अपने प्रकाशरूप राज्य के (शोभसे) शोभा के लिये (अनुमदन्ति) हर्ष का हेतु होती हैं, वे (इत्था) इस प्रकार से (स्वादोः) स्वादयुक्त (विषुवतः) व्याप्तिवाले (मध्वः) आदि गुण को (पिबन्ति) पीती हैं, वैसे तुम भी वर्त्ता करो ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। अपनी सेना के पति और वीरपुरुषों की सेना के विना निज राज्य की शोभा तथा रक्षा नहीं हो सकती। जैसे सूर्य की किरण सूर्य के विना स्थित और वायु के विना जल का आकर्षण करके वर्षाने के लिये समर्थ नहीं हो सकती, वैसे सेनाध्यक्ष और राजा के विना प्रजा आनन्द करने को समर्थ नहीं हो सकती ॥ १० ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥