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Rigveda Mandal 1 / Sukta 83 / Mantra 6

191 Sukta
6 Mantra
1/83/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब॒र्हिर्वा॒ यत्स्व॑प॒त्याय॑ वृ॒ज्यते॒ऽर्को वा॒ श्लोक॑मा॒घोष॑ते दि॒वि। ग्रावा॒ यत्र॒ वद॑ति का॒रुरु॒क्थ्य१॒॑स्तस्येदिन्द्रो॑ अभिपि॒त्वेषु॑ रण्यति ॥

ब॒र्हिः । वा॒ । यत् । सु॒ऽअ॒प॒त्याय॑ । वृ॒ज्यते॑ । अ॒र्कः । वा॒ । श्लोक॑म् । आ॒ऽघोष॑ते । दि॒वि । ग्रावा॑ । यत्र॑ । वद॑ति । का॒रुः । उ॒क्थ्यः॑ । तस्य॑ । इत् । इन्द्रः॑ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वेषु॑ । र॒ण्य॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
बर्हिर्वा यत्स्वपत्याय वृज्यतेऽर्को वा श्लोकमाघोषते दिवि। ग्रावा यत्र वदति कारुरुक्थ्य१स्तस्येदिन्द्रो अभिपित्वेषु रण्यति ॥

बर्हिः। वा। यत्। सुऽअपत्याय। वृज्यते। अर्कः। वा। श्लोकम्। आऽघोषते। दिवि। ग्रावा। यत्र। वदति। कारुः। उक्थ्यः। तस्य। इत्। इन्द्रः। अभिऽपित्वेषु। रण्यति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यत्र) जिस (दिवि) प्रकाशयुक्त व्यवहार में (उक्थ्यः) कथनीय व्यवहारों में निपुण प्रशंसनीय शिल्प कामों का कर्त्ता (इन्द्रः) परमैश्वर्य को प्राप्त करनेहारा विद्वान् (अभिपित्वेषु) प्राप्त होने योग्य व्यवहारों में (यत्) जिस (स्वपत्याय) सुन्दर सन्तान के अर्थ (बर्हिः) विज्ञान को (वृज्यते) छोड़ता है (अर्कः) पूजनीय विद्वान् (श्लोकम्) सत्यवाणी को (वा) विचारपूर्वक (आघोषते) सब प्रकार सुनाता है (ग्रावा) मेघ के समान गम्भीरता से (वदति) बोलता है (वा) अथवा (रण्यति) उत्तम उपदेशों को करता है, वहाँ (तस्येत्) उसी सन्तान को विद्या प्राप्त होती है ॥ ६ ॥
Essence
विद्वान् लोगों को योग्य है कि जैसे जल छिन्न-भिन्न होकर आकाश में जा वहाँ से वर्षा से सुख करता है, वैसे कुव्यसनों को छिन्न-भिन्न कर विद्या को ग्रहण करके सब मनुष्यों को सुखी करें। जैसे सूर्य अन्धकार का नाश और प्रकाश करके सब प्राणियों को सुखी और दुष्ट चोरों को दुःखी करता है, वैसे मनुष्यों के अज्ञान का नाश विज्ञान की प्राप्ति करा के सबको सुखी करें। जैसे मेघ गर्जना कर और वर्ष के दुर्भिक्ष को छुड़ा सुभिक्ष करता है, वैसे ही सत्योपदेश की वृष्टि से अधर्म का नाश धर्म के प्रकाश से सब मनुष्यों को आनन्दित किया करें ॥ ६ ॥ इस सूक्त में सेनापति और उपदेशक के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर वह किस प्रकार से क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥