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Rigveda Mandal 1 / Sukta 83 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/83/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
य॒ज्ञैरथ॑र्वा प्रथ॒मः प॒थस्त॑ते॒ ततः॒ सूर्यो॑ व्रत॒पा वे॒न आज॑नि। आ गा आ॑जदु॒शना॑ का॒व्यः सचा॑ य॒मस्य॑ जा॒तम॒मृतं॑ यजामहे ॥

य॒ज्ञैः । अथ॑र्वा । प्र॒थ॒मः । प॒थः । त॒ते॒ । ततः॑ । सूर्यः॑ । व्र॒त॒ऽपाः । वे॒नः । आ । अ॒ज॒नि॒ । आ । गाः । आ॒ज॒त् । उ॒शना॑ । क॒व्यः । सचा॑ । य॒मस्य॑ । जा॒तम् । अ॒मृत॑म् । य॒जा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि। आ गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे ॥

यज्ञैः। अथर्वा। प्रथमः। पथः। तते। ततः। सूर्यः। व्रतऽपाः। वेनः। आ। अजनि। आ। गाः। आजत्। उशना। काव्यः। सचा। यमस्य। जातम्। अमृतम्। यजामहे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (प्रथमः) प्रसिद्ध विद्वान् (अथर्वा) हिंसारहित (पथः) सन्मार्ग को (तते) विस्तृत करता है, जैसे (वेनः) बुद्धिमान् (व्रतपाः) सत्य का पालन करनेहारा सब प्रकार (आजनि) प्रसिद्ध होता है, जैसे (ततः) विस्तृत (सूर्यः) सूर्यलोक (गाः) पृथिवी में देशों को (आजत्) धारण करके घुमाता है, जैसे (काव्यः) कवियों में शिक्षा को प्राप्त (उशना) विद्या की कामना करनेवाला विद्वान् विद्याओं को प्राप्त होता है, वैसे हम लोग (यज्ञैः) विद्या के पढ़ने-पढ़ाने सत्संयोगादि क्रियाओं से (यमस्य) सब जगत् के नियन्ता परमेश्वर के (सचा) साथ (जातम्) प्राप्त हुए (अमृतम्) मोक्ष को (आयजामहे) प्राप्त होवें ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सत्य मार्ग में स्थित होके सत्य क्रिया और विज्ञान से परमेश्वर को जान के मोक्ष की इच्छा करें, वे विद्वान् मुक्ति को प्राप्त होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर वे किससे किसको प्राप्त होते हैं, यह विषय कहा है ॥