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Rigveda Mandal 1 / Sukta 83 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/83/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आपो॒ न दे॒वीरुप॑ यन्ति हो॒त्रिय॑म॒वः प॑श्यन्ति॒ वित॑तं॒ यथा॒ रजः॑। प्रा॒चैर्दे॒वासः॒ प्र ण॑यन्ति देव॒युं ब्र॑ह्म॒प्रियं॑ जोषयन्ते व॒राइ॑व ॥

आपः॑ । न । दे॒वीः । उप॑ । य॒न्ति॒ । हो॒त्रिय॑म् । अ॒वः । प॒श्य॒न्ति॒ । विऽत॑तम् । यथा॑ । रजः॑ । प्रा॒चैः । दे॒वासः॑ । प्र । न॒य॒न्ति॒ । दे॒व॒ऽयुम् । ब्र॒ह्म॒ऽप्रिय॑म् । जो॒ष॒य॒न्ते॒ । व॒राःऽइ॑व ॥

Mantra without Swara
आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः। प्राचैर्देवासः प्र णयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वराइव ॥

आपः। न। देवीः। उप। यन्ति। होत्रियम्। अवः। पश्यन्ति। विऽततम्। यथा। रजः। प्राचैः। देवासः। प्र। नयन्ति। देवऽयुम्। ब्रह्मऽप्रियम्। जोषयन्ते। वराःऽइव ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (देवासः) विद्वान् लोग मेघ को (आपो न) जैसे जल प्राप्त होते हैं, वैसे (देवीः) विदुषी स्त्रियों को (उपयन्ति) प्राप्त होते हैं और (यथा) जैसे (प्राचैः) प्राचीन विद्वानों के साथ (विततम्) विशाल और जैसे (रजः) परमाणु आदि जगत् का कारण (होत्रियम्) देने-लेने के योग्य (अवः) रक्षण को (पश्यन्ति) देखते हैं (वराइव) उत्तम पतिव्रता विद्वान् स्त्रियों के समान (ब्रह्मप्रियम्) वेद और ईश्वर की आज्ञा में प्रसन्न (देवयुम्) अपने आत्मा को विद्वान् होने की चाहनायुक्त (प्रणयन्ति) नीतिपूर्वक करते और (जोषयन्ते) इसका सेवन करते औरों को ऐसा कराते हैं, वे निरन्तर सुखी क्यों न हो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। किस हेतु से विद्वान् और अविद्वान् भिन्न-भिन्न कहाते हैं, इसका उत्तर है कि जो धर्मयुक्त शुद्ध क्रियाओं को करें, सबके शरीर और आत्मा का यथावत् रक्षण करना जानें और भूगर्भादि विद्याओं से प्राचीन आप्त विद्वानों के तुल्य वेदद्वारा ईश्वरप्रणीत सत्यधर्म मार्ग का प्रचार करें, वे विद्वान् हैं और जो इनसे विपरीत हों वे अविद्वान् हैं, इस प्रकार निश्चय से जानें ॥ २ ॥
Subject
फिर विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥